National:-डॉ.हरिसुमन बिष्ट ने इतिहास,लोक-स्मृति और मानवीय संवेदना को जोड़कर रचा प्रभावशाली नाट्य आख्यान,इतिहास के पन्नों से वर्तमान से संवाद करता नाटक ‘मोला’

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इतिहास को साहित्य में प्रस्तुत करना केवल बीती घटनाओं को दोहराना नहीं,बल्कि उनके भीतर छिपे मनुष्य,उसकी संवेदना,संघर्ष और समय की धड़कन को सामने लाना भी है। डॉ.हरिसुमन बिष्ट का नाटक ‘मोला’ इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण कृति है। गढ़वाल के शाह वंश और गोरखा आक्रमण की पृष्ठभूमि में रचा गया यह नाटक इतिहास को केवल दस्तावेज की तरह प्रस्तुत नहीं करता,बल्कि उसके माध्यम से कला,सत्ता,स्त्री-अस्मिता और जनजीवन के प्रश्नों को सामने लाता है।

नाटक की विशेषता यह है कि इतिहास यहाँ केवल राजाओं और युद्धों की कहानी नहीं रह जाता। राजनीतिक संघर्ष और सत्ता परिवर्तन के बीच आम जनता की पीड़ा भी कथा का महत्वपूर्ण हिस्सा बनती है। राजसत्ता के भीतर के मतभेद और बाहरी शक्ति के प्रभाव को लेखक इस तरह देखते हैं कि इतिहास के पीछे छूटता हुआ आम मनुष्य दिखाई देने लगता है। यही दृष्टि ‘मोला’ को अतीत की कथा से आगे ले जाती है।

डॉ.बिष्ट ने ऐतिहासिक घटनाओं और पात्रों के साथ कल्पना के लिए भी स्थान बनाया है। सोमा,कीर्तिसिंह और गंगा राम जैसे पात्र तथा उनसे जुड़े प्रसंग कथा को मानवीय धरातल देते हैं। इससे इतिहास घटनाओं का क्रम न रहकर संबंधों,संघर्षों और भावनाओं का संसार बनता है।

नाटक का केंद्रीय व्यक्तित्व मोलाराम है, लेकिन उनके माध्यम से लेखक की दृष्टि कलाकार की सामाजिक जिम्मेदारी तक पहुँचती है। कवि और चित्रकार मोलाराम के सामने सत्ता और कला का संसार है,लेकिन बदलते समय के साथ उनकी संवेदना जनता की पीड़ा से जुड़ती जाती है। अंततःन्याय,शांति और जनकल्याण उनके जीवन के उद्देश्य से जुड़ते हैं। यहाँ कला केवल सौंदर्य की अभिव्यक्ति नहीं,बल्कि समाज के प्रति उत्तरदायित्व का माध्यम बनती है।

सोमा का चरित्र नाटक में स्त्री-अस्मिता और प्रतिरोध का स्वर जोड़ता है। उसके साथ होने वाली हिंसा और उसके बाद उसका संघर्ष उसे केवल पीड़ित पात्र नहीं रहने देता। उसके माध्यम से इतिहास के भीतर स्त्री की अपनी आवाज सुनाई देती है। मोलाराम और सोमा के प्रतिरोध के रास्ते अलग हैं,लेकिन दोनों अन्याय के विरुद्ध खड़े दिखाई देते हैं।

‘मोला’ का सांस्कृतिक संसार भी उल्लेखनीय है। गढ़वाली,कुमाऊँनी और नेपाली भाषिक प्रयोग,लोकगीत,स्थानीय शब्दावली,परंपराएँ और पहाड़ी जीवन से जुड़े संकेत नाटक को उसकी भौगोलिक और सांस्कृतिक जमीन देते हैं। भाषा में सहजता के साथ काव्यात्मकता और क्षेत्रीय रंग का मेल दिखाई देता है।

डॉ.हरिसुमन बिष्ट की लेखनी की सार्थकता इस बात में है कि वे इतिहास को अतीत में बंद नहीं करते। सत्ता-संघर्ष,आंतरिक मतभेद,जनता की पीड़ा,स्त्री-अस्मिता और कलाकार की जिम्मेदारी जैसे प्रश्न आज भी प्रासंगिक हैं। इसीलिए ‘मोला’ इतिहास को याद करने के साथ-साथ वर्तमान को समझने का अवसर भी देता है। ‘मोला’ की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि इतिहास यहाँ समाप्त हो चुका समय नहीं, बल्कि वर्तमान से संवाद करने वाला जीवंत अनुभव बन जाता है। डॉ.हरिसुमन बिष्ट ने इतिहास और कल्पना,लोक-संस्कृति और मानवीय संवेदना तथा कला और जनसरोकार को जोड़कर ऐसी नाट्य-कृति रची है,जो अपने ऐतिहासिक परिवेश से निकलकर आज के पाठक से भी सवाल करती है।

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