आज है अक्षय तृतीया,बन रहा है लक्ष्मी नारायण योग, सर्वार्थ सिद्धि योग और गजकेसरी योग,पढ़ें इसके शुभ-अशुभ परिणाम

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आचार्य हिमांशु ढौण्डियाल

वैदिक ज्योतिष शास्त्र की पंचांग परम्परा के अनुसार अक्षय तृतीया को स्वयं सिद्धि मुहूर्त कहा जाता है। स्वयं सिद्ध मुहूर्त होने के कारण इस दिन कोई भी शुभ कार्य करने के लिए तिथि वार नक्षत्र करण योग लग्न आदि देखने की आवश्यकता नहीं होती है। इस दिन किसी भी तरह का, कोई भी मांगलिक कार्य किया जा सकता है। क्योंकि मांगलिक कार्यों के लिए यह दिन सर्वोत्तम माना गया है। अक्षय तृतीया के दिन का हर लग्न हर घड़ी शुभ होती है। इस दिन भगवान नारायण के छठे अवतार भगवान परशुराम जी का प्राकट्य उत्सव मनाया जाता है। वर्ष 2021 में अक्षय तृतीया के पावन अवसर पर वैदिक ज्योतिष शास्त्र की दृष्टि से कई महत्वपूर्ण और शुभ योगों का संयोग भी बन रहा है जो इस दिन के महत्व को कई गुना बढ़ाने का कार्य करेंगे। अक्षय तृतीया के अवसर पर कौन-कौन से शुभ योग बन रहे हैं, इस दिन क्या क्या कार्य हमें करने चाहिए, अक्षय तृतीया पूजन मुहूर्त का सही समय, आदि अनेकों विषयों को पर हम आपको विस्तार से बताते है।

वर्ष 2021 में अक्षय तृतीया 14 मई शुक्रवार को है। इस अवसर पर लक्ष्मी नारायण योग, सर्वार्थ सिद्धि योग और गजकेसरी योग का संयोग हो रहा है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार अक्षय तृतीया के दिन जप,तप, स्नान दान आदि करने से व्यक्ति को अनन्त गुणा शुभ फलों की प्राप्ति होती है। साथ ही अक्षय तृतीया के दिन यदि अपने पितरों को जल दान दिया जाए, अर्थात पितृतर्पण किए जाएं तो कहा जाता है कि, उनकी आत्मा अनंत काल के लिए तृप्त होती है। और पितृदोष से मुक्ति मिलती है। वैदिक ज्योतिष शास्त्र के अनुसार अक्षय तृतीया के दिन पड़ने वाले लक्ष्मी नारायण योग को बहुत ही शुभ योग माना जाता है। इस योग में बुध ग्रह को भगवान विष्णु और शुक्र ग्रह को माता लक्ष्मी की श्रेणी दी गई है। लक्ष्मी नारायण योग व्यक्ति के सुख और सौभाग्य को बढ़ाने वाला योग होता है।

इस दिन सर्वार्थ सिद्धि योग होने से इसका महत्व हजार गुणा बढ़ जाता है। सर्वार्थ सिद्धि योग के बारे में कहा जाता है कि, यदि कोई भी शुभ काम करना हो और उसके लिए शुभ मुहूर्त नही मिल रहा हो तो, उसे सर्वार्थसिद्धि योग में किया जा सकता है। ऐसे में इस वर्ष अक्षय तृतीया पर यह शुभ योग बन रहा है। अतः आप इस दिन विवाह, गृह प्रवेश, भूमि पूजन, या कोई भी नया कार्य प्रारंभ कर सकते हैं। वैदिक ज्योतिष शास्त्र के अनुसार गजकेसरी योग भी एक बहुत शुभ योग माना गया है। जिस व्यक्ति की कुंडली में यह योग होता है उसे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता सहज ही प्राप्त हो जाती है। इस वर्ष अक्षय तृतीया के अवसर पर दृष्टिपात से गजकेसरी योग का निर्माण भी हो रहा है। क्योंकि बृहस्पति चंद्रमा को पूर्ण दृष्टि से देख रहा है जिसके चलते गजकेसरी योग का भी निर्माण हो रहा है। वैदिक ज्योतिष शास्त्र की पञ्चाङ्ग परम्परा के अनुसार प्रत्येक वर्ष वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतिया को अक्षय तृतीया का पर्व मनाया जाता है। इस समय सूर्य और चंद्रमा दोनों ही उच्च भाव में स्थित होते हैं। इस वर्ष अक्षय तृतीया का शुभ पूजन मुहूर्त प्रातः 05 बजकर 40 मिनट से दोपहर 12 बजकर 17 मिनट तक रहेगा। तृतीया तिथि मई 14, 2021 को प्रातः 05 बजकर 41 मिनट पर प्रारंभ हो रही है और 15 मई 2021 को प्रातः 8 बजकर 1 मिनट पर समाप्त होगी।

अक्षय तृतीया के अवसर पर गंगा आदि पवित्र नदियों में स्नान का भी बहुत महत्व है। हालांकि मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए, कोविड काल को देखते हुए, अपनी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए यदि गंगा आदि नदियों में स्नान नहीं किया जा सकता तो घर में ही स्नान के जल में गंगा जल मिलाकर उस से नहाने से व्यक्ति के सभी तरह के पाप और कष्ट अवश्य ही दूर हो जाएंगे, ऐसा हमें पूर्ण विश्वास है। इसके अतिरिक्त स्नान करने के उपरांत दान का संकल्प लेकर दान अवश्य करें। ऐसा करने से व्यक्ति का जीवन सदैव सुख पूर्वक व्यतीत होता है। इस दिन भगवान विष्णु का विशेष पूजन कर विष्णु सहस्त्रनाम आदि पाठ अवश्य करना चाहिए। साथ ही इस अवसर पर पौराणिक कथा का श्रवण करना विशेष शुभ फलदायक होता है। आइए हम सब भी एकाग्रचित्त हो कर, संक्षिप्त रूप से इस कथा को श्रवण करें।

यह खबर कुछ खास है

अक्षय तृतीया के पर्व से संबंधित भगवान कृष्ण और उनके प्रिय सखा विप्र सुदामा की एक कथा बहुत प्रचलित है। जब भगवान कृष्ण के परम मित्र सुदामा अपनी प्रिय धर्म भार्या के बार बार निवेदन करने पर भगवान श्री कृष्ण के दर्शनार्थ द्वारिका गए, तो मित्र के लिए उपहार स्वरूप चार मुट्ठी चावल भी ले गए। किन्तु अपने बाल सखा कान्हा को द्वारकाधीश के रूप में देखकर, उनके ऐश्वर्य को देखकर अपने लाए हुए चार मुट्ठी चावलों को देने में संकोच करने लगे। किन्तु सर्वज्ञ भगवान कृष्ण से कहाँ कुछ छुपने वाला था। भगवान कृष्ण ने सुदामा जी से वह चावल की पोटली ले ही ली। और तीन मुट्ठी चावल भगवान ने स्वयं खा कर सुदामा को बिन मांगे ही तीन लोक की सम्पदा प्रदान कर दी। साथ ही विप्रवर सुदामा के लाए हुए वह चावल भगवान ने अपने पूरे परिकर को, अपने पूरे परिवार को प्रसाद रूप में वितरित भी किए। मान्यताओं के अनुसार यह दिन अक्षय तृतीया का ही पावन दिन था। और तभी से इस दिन भगवान की विशेष पूजा, एवं ब्राह्मणों को दान देने का विशेष महत्व है। यहाँ यह विशेष रूप से समझने योग्य है कि ब्राह्मणों के पास नाम धन, अर्थात भगवान के नाम जप का धन प्रचुर मात्रा में होता है। और यजमान के पास भौतिक धन की उपलब्धता होती है। दोनों ही एक दूसरे के पूरक हैं। एक के पास धर्म है तो एक के पास अर्थ। जो धन धर्म के मार्ग में लगे, उसी धन की सार्थकता है। और जिस धर्म से जन कल्याण हो, वही धर्म सार्थक है। तभी तो भगवान सर्वशक्तिमान होते हुए भी कहते हैं,

विप्र प्रसादात् धरणी धरोहम

विप्र प्रसादात् कमला वरोहम

विप्र प्रसादात्अजिता$जितोहम

विप्र प्रसादात् मम् राम नामम् ।।

अर्थात , ब्राह्मणों के आशीर्वाद से ही मैंने धरती को धारण कर रखा है अन्यथा इतना भार कोई अन्य पुरुष कैसे उठा सकता है, ब्राह्मणों के आशीर्वाद से नारायण हो कर मैंने लक्ष्मी को वरदान में प्राप्त किया है, ब्राह्मणों के आशीर्वाद से मैं हर युद्ध भी जीत गया और ब्राह्मणों के आशीर्वाद से ही मेरा नाम “राम” हुआ है, अतः ब्राह्मण सर्व पूज्यनीय है। और ब्राह्मणों का अपमान ही कलियुग में पाप की वृद्धि का मुख्य कारण है।

आचार्य हिमांशु ढौण्डियाल का का संपर्कसूत्र,9634235902