लड़खड़ाती स्वास्थ्य व्यवस्था के बीच,जरूरी है क्लीनिकल इस्टैब्लिशमेंट एक्ट!

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2002

देशभर में,अप्रशिक्षित, झोलाछाप, कंप्लीट व्यापारी हो चुके डॉक्टरों के चंगुल से लोक स्वास्थ्य और इस पर भरोसा बचाए रखने के लिए 2010 में केंद्र सरकार ने क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट तैयार किया , लागू नहीं हुआ 2016 में संशोधन हुआ ,इसके लागू होने से पहले ही डॉक्टरों के संगठन की देशव्यापी हड़ताल ने इसका लागू होना रुकवा दिया, कारण मनमानी में निगरानी की संभावना बढ़ जाना भर था।

सीधी सपाट देसी भाषा में कहें तो क्लीनिकल इस्टैब्लिशमेंट एक्ट सिर्फ यह व्यवस्था कर रहा था। जो भी डॉक्टर क्लीनिक चलाएगा उसका, केंद्र,राज्य अथवा जिला स्तर पर गठित जिलाधिकारी की अध्यक्षता कि समिति जिसमें सीएमओ तथा अन्य स्वास्थ्य विशेषज्ञ हों से पहले खुद को रजिस्टर्ड करवाएगा, (धारा 11)अपने संसाधनों को स्पष्ट करेगा डॉक्टरों की योग्यता बताएगा और जो चिकित्सा सेवा शुल्क या अन्य टेस्ट आदि का शुल्क है। उसको अपने रिसेप्शन पर साफ-साफ प्रदर्शित करेंगा( धारा 33) क्लीनिक की मनमानी रोकने के लिए समिति औचक निरीक्षण करेगी और प्रथम बार में 10 हजार फिर 50 हजार और 5 लाख तक जुर्माना लगा सकेगी (धारा 12) ऐसा करने से चिकित्सा व्यवसाय में छुपा- छुपी और भय का जो व्यापार है। वह साफ होता मरीज को पता होता वह जिस डॉक्टर को दिखा रहा है, उस की शैक्षिक योग्यता क्या है । उसके किस इलाज के लिए कितना खर्च आने वाला है।

एक बीमार और उसके परिजन रोज ही अस्पताल में मनमर्जी के हिडन चार्जेज से पीड़ित रहते हैं। सवाल इसलिए नहीं करते कि उनके मरीज की जान फंसी होती है। कोरोना का संकट देखिए,निजी अस्पतालों ने या तो हाथ खड़े किए हैं या जो कोरोना का इलाज कर रहे हैं वह ₹25हजार रोज का पैकेज दे रहे हैं। जिसमें कमरा और ऑक्सीजन के अलावा कुछ ज्यादा खास नहीं होता,दवाई तो सब सामान्य सी हैं। फिर यह इतना बड़ा पैकेज? कोई जवाब नहीं विशेषज्ञ के परामर्श से तय कोई दर नही। हद देखिए जब से पता चला है,कोरोना का सही पता चेस्ट के सिटी स्कैन से चल रहा है। तब से सीटी स्कैन के चार्जेस हजार रुपए से बढ़कर 3 हजार हो गए। ₹25हजार रोज का पैकेज लेने वाले प्राइवेट अस्पतालों के हाल यह हैं,कि जैसे ही मरीज की स्थिति गंभीर होती है। वह ऑक्सीजन और वेंटिलेटर का बहाना बनाकर उसे डिस्चार्ज कर देते हैं। तब वह निचुडकर,सुशीला तिवारी,दून हास्पिटल जैसे सरकारी अस्पताल में जाता है जहां प्राइवेट अस्पतालों के व्यापारिक षड्यंत्र के कारण मौत का आंकड़ा बढ़ जाता है।

हम जनहित के नाम पर जनता से खून की और ऑक्सीजन की गुहार लगा रहे हैं। मगर कभी न कभी हमें सरकार से मजबूती से क्लीनिकल इस्टैब्लिशमेंट एक्ट लागू करने की मांग करनी होगी। तभी भारत के संविधान के अनुच्छेद 47 में दिए गए स्वास्थ्य के प्रावधान की भरपाई हो सकेगी।

प्रमोद शाह जी की फेसबुक वाल से साभार