
{1}
गॉंव की सर्दी
सरसों के फूलों
पर बिखरें है
म्हीन ओस के
मोतियों से
बहता नीर
कोहरे की ओट
में लिपटी खेतों की
टेढ़ी-मेढ़ी मेड़ो
पर जमी बर्फ
की टुकड़ियां
घर के ऑंगन में
जलते हारों से
उड़ती ऑंच की
पतंगें
रजाई से बाहर
शीत से कपकपाते
पॉंव की उंगलियां
नीलगायों की
थरथराते अधरों
पर जमी धुंआ
की लपेटें
धूॅंप आने की
बाट में बिजली के
खंम्भो पर बैठे
अनगिनत परिंदों की
थरथराती देह
खेतों में उड़ती
{2}
खेतों में उड़ती तीतरी
तीतरी बतालाती है
मौसम का हाल
किंतु उसकी बात
को हल्के में
लेते हैं कृषक
मृगों के पदचिन्हों
पर लिखी है
बारिश आने की
कथा
खेतों की पगडंडियों
पर छपे हुए है
पैरों के निशान
जिससे प्रतित
होता है सावन का
बरसना
मोरनी के बिखरे
हुए पंख देते है
उड़ते मेघों का संदेश
{3}
पनघट की कोयलिया
पनघट के चाक
पर बैठी कोयलिया
सुनाती है
गाॅंव की महिलाओं
की कानाफूसी
सास के साथ
हुए झगड़े
नंनद की गालियां
मायके जाने की
चाह
घघरी भरने आती
महिलाओं की
घण्टों इकट्ठी
भीड़ को कैद
कर लेती है
वह स्वयं की
दो ऑंखों में
कभी नीर में
चोंच मार देती है
तो कभी रस्सी
को खीच लेती है
अठखेलियां करती
रहती है दिनभर
पनिहारियों के साथ
कवि का संपर्कः-जनपद – झुंझुनूं ,राजस्थान
व्यवसाय-कृषि
ई-मेल – nihal6376r@gmail.com

















