मोला राम के जीवन के अनछुए पहलू,’बत्तीस राग गाओ मोला’

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प्रियंका भाकुनी

बहुमुखी प्रतिभा के धनी डॉ. हरिसुमन बिष्ट हिन्दी भाषा साहित्य के ऐसे यशस्वी और लोकप्रिय साहित्यकार हैं जिन्होंने हिंदी साहित्य की विभिन्न विधाओं में लेखन कर उसे समृद्ध किया है। उपन्यास, कहानी, नाटक एंव यात्रा साहित्य के साथ-साथ सिनेमा के क्षेत्र में एक पटकथा लेखक के रूप में अपनी एक अलग पहचान बनाने वाले डॉ. हरिसुमन बिष्ट का नवीनतम उपन्यास ‘बत्तीस राग गाओ मोला'(2021) विजया बुक्स से प्रकाशित होकर आया है।

यह सन् 1790 से लेकर 1815 तक के कालखंड को समेटता हुआ 21 भागों में विभक्त 256 पृष्ठों का एक ऐतिहासिक उपन्यास है। जिसकी कथा नेपाल के सैनिक अमर सिंह थापा द्वारा उत्तराखंड के गढ़वाल और कुमाऊँ पर गोरखाओं का शासन स्थापित करने के वृतांत को लेकर चली है। यह उपन्यास इस मायने में महत्वपूर्ण है कि इसमें नेपाल, गढ़वाल और कुमाऊँ मे चल रही राजनीतिक हलचल, सत्ता की मंदाधता से उपजी आपसी टकराहट, सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियाँ, गढ़ नरेशों के शौर्य एवं पराक्रम के गौरवशाली इतिहास और प्रतिष्ठित कवि-चित्रकार और राजनीतिज्ञ “मोला राम” के जीवन के अंछुए पहलुओं का चित्रण कर उस समय के यथार्थ के अंतर्द्वंद को अभिव्यक्त किया गया है।

इस उपन्यास में गढ़ राज्य के महान काव्य की रचना करने वाले कवि एंव चित्रकार ‘मोला राम’ के जीवन के उन पहलुओं पर प्रकाश डाला गया है जिनसे हम अब तक अछूते रहे हैं। कथा के अनुसार मोला राम गढ़ राज्य के श्रीदरबार के प्रसिद्ध कवि, कलाकार, सभासद और मुद्राधिपति थे। जिनके हाथ में सदैव चाँदी के मूठ वाली छड़ी रहती थी। अपनी चित्रशाला में मग्न रहने वाले मोला का एक छोटा सा परिवार था। जिसमें पत्नी और दो बच्चे थे। उनकी दुनिया भी निराली थी जिसमें अनेक किस्से थे और उन किस्सों के किरदारों का प्रतिबिंब उनके साहित्य और चित्रों में मिलता था। ‘चैतू’ और ‘माणकू’ को भी उनका स्नेह और अपनत्व प्राप्त था। अत: उनकी चित्रशाला से चैतू और माणकू भी जुड़े रहे। यह मोला राम के व्यक्तित्व का वो हिस्सा है जो जिंदगी में सहभागिता के महत्व को स्वीकार कर, काम में एक-दूसरे का हांथ बटाते हुए जिंदगी रूपी सागर को पार करने की पैरवी करता है। चार गढ़ नरेशों को अपनी विद्वता और कला से प्रभावित कर उनका मन मोह लेने वाले इस महान कवि की दुनिया में, ‘लछमी’ और संन्यासिनी ‘सोमा’ रूपी पवन उनके हृदय में प्रेम रूपी बगिया के फूलों को सहलाती हुई चलती है। उनकी कला की किरणें सूर्य की भांति देश दुनिया में बिखरी हुईं थीं। जिससे कान्तिपुर भी अछूता नही रहा था। कान्तिपुर के नेपाल नरेश ‘रण बहादूर’ उनकी कविताओं और चित्रों पर मंत्रमुग्ध हो गए थे। अत: लेखक ने उपन्यास में मोला राम के जीवन को अपने चिंतन और सृजन का विषय बनाया है।

मोला राम ने अपने चित्रों के माध्यम से गढ़ राज्य के लोक सौन्दर्य और गौरवशाली इतिहास का परिचय दिया है। उनका हृदय लोक के रंगो से रंगा हुआ था। लोक रंग के सयोंजन के कारण ही उनकी कविताओं में ताज़गी और चित्रों में नए रंग मिलते हैं। उपन्यास में एक स्थान पर जब महाराज प्रद्युम्न शाह राज्य से संबन्धित समस्या पर सलाह लेने हेतु मोला राम को राज्य में उपस्थित होने का संदेश भिजवाने का आदेश देते हैं तो वजीर जयदेव कहता है- “वे गढ़ कला रत्न होने के बावजूद राज्य के जन जीवन से हिलेमिले रहते हैं, उनके बीच उन्हें रचना-बसना अच्छा लगता है।” (पृ. 203)।

कवि मोला राम की गढ़ राज्य के प्रति प्रतिबद्धता असंदिग्ध थी। गढ़ राज्य के चरित्र को उभारते हुए वे एक स्थान पर कहते हैं- “गढ़ राज्य के मूलाधार करुणा, दया और न्याय रहे हैं।”(पृ.81) उपन्यास में कवि मोला राम एक दार्शनिक के रूप में जीवन और कला के अंतरसंबंधों का सूक्ष्म विश्लेषण करते हुए सार्थक जीवन की समझ का बोध कराते हैं। ‘मौन अधरों के स्वर’ नामक शीर्षक में कवि मोला राम और संन्यासिनी ‘सोमा’ के बीच हुए संवाद का यह अंश देखिए- मोला- “मन में हलचल न हो तो कविता केसे हो सकती है? मन विचलन ही तो कविता है संन्यासिनी! कविता मन को भी विचलित कर देती है ?” (पृ.70) संन्यासिनी- “चंचल मन का स्थिर होना ही कविता का होना है कविवर” (वही) निर्णायक दौर में मित्रों की असली पहचान की परिभाषा बतलाते हुए मोला राम, चित्रकार माणकू से कहते हैं– “सच्चा मित्र वही होता है, जो मन की आँच को समझ लेता है और दु:ख-सुख में साथ खड़ा रहता है।” (पृ.58) मोला के लिए कला का जीवन में क्या स्थान था इसका उद्घाटन लेखक ने ‘उस तरह नहीं लोटा मोल’ नामक शीर्षक के अंश में कुँवर पराक्रम के साथ हुए संवादों के माध्यम से कुछ इस प्रकार किया है।

मोला- “यह तो आप मानते ही हैं कुँवर ! मेरे लिए कला अपने अभीष्ट को पाने का साधन है- जीवन से बढ़कर है। ….मेरे लिए जीवन का होना, उसमें कला का होना सौभाग्य की बात है।” (पृ.109) “कलाओं में भी धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है। जिस घर में साहित्य, कला और संगीत की प्रतिष्ठा अधिक होती है, वहाँ सदा शुभ होता है। (वही)

आखिर क्यूँ कोई व्यक्ति अपने समाज, जाति-धर्म और गांव देस के विचारों से विलग होकर दूसरे समाज के विचारों की ओर उन्मुख हो जाता है। इस पर मोला का यह कथन अत्यंत महत्वपूर्ण जान पड़ता है-“कोई भी व्यक्ति दूसरे समाज जाति-धर्म और गांव देस के विचारों को तभी अपनाता है, जब उसकी अपनी परवरिश की दुनिया का जीवन दर्शन, उसके सामाजिक जीवन के रीति-रिवाज और परंपराएं बेमानी और उनका सौंदर्यबोध विकास का मार्ग अवरुद्ध करने का संकेत देते हों- तभी वह उसमें रचना-बसना नहीं चाहता।”(पृ.128) इस प्रकार हम देख सकते है कि लेखक ने उपन्यास में गढ़वाल और कुमाऊँ के सांस्कृतिक पक्ष को उभारकर जीवन दर्शन पर गहनता से चिंतन-मनन करते हुए मोला की अनकही दास्तां का प्रस्तुतीकरण किया है।

यह उपन्यास गढ़ राज्य के इतिहास के उस कालखंड पर प्रकाश डालता है जब राजसत्ता के लिए दो सहोदर भाइयों प्रद्युम्न शाह और कुँवर पराक्रम के बीच खूनी संघर्ष चला था। जिसके कारण दोनों पक्षों के समर्थक आपस में भिड़  गए थे और उन्होंने गोरखा सैनिकों की भांति ही गढ़ राज्य में खूब लूट मचाई जो कि किसी भयानक दृश्य से कम नहीं थी। कला, साहित्य, संगीत और संस्कृति के प्रति उनकी उपेक्षापूर्ण दृष्टि के चलते गढ़ नरेशों के शौर्य-पराक्रम की निशानियों के साथ ही गढ़ की वास्तुकला भी ध्वस्त हो गई। आपसी कलह ने गढ़ राज्य के सम्मान को अपने पेरों तले रौंद डाला और गढ़ राज्य की सत्ता की आग में वहाँ की आम जनता झुलसती रही, हर जगह मार काट चल रही थी। अत: उन्होंने सिर्फ असहाय, गरीब और ग्रामीण किसानों को मार काटा। जिससे सैकड़ो ग्रामीण किसान लोग मारे गए। दूसरी तरफ गोरखा सैनिकों द्वारा कुमाऊँ और गढ़ राज्य में मचाई लूट खसोट, स्त्रियों के साथ की गई बर्बरता, क्रूरता, अमानवीय व्यावहार और उन्माद वश की गई नगर में बसे निर्दोष लोगों की हत्या और आम जन की हुई दुर्दशा के कारण ही गढ़ राज्य को भारी नुकशान हुआ और वह धीरे धीरे विनाश की ओर उन्मुख हो चला था।

इस प्रकार गढ़ राज्य दोहरी मार झेल रहा था। एक तरफ गढ़ राज्य का आपसी मनमुटाव और दूसरी तरफ गोरखा सैनिकों का उत्पात् जिसके कारण किसान पलायन कर रहे थे। लेखक ने इस आपसी मन-मुटाव और ग्रामीण किसानों की त्रस्त और असहाय स्थिति का ऐसा वर्णन किया है जिससे पाठक की संवेदना वहाँ के नगरवासियों से जुड़ जाती है और पाठक उस समय के समाज में प्रवेश कर जाता है जिसका चित्रण लेखक ने बड़ी ही समर्थ में भाषा में किया है।

जब जिंदगी की ताज़गी को सोखता हुआ सत्ता का यह खूनी खेल समाप्त हो जाता है और गढ़ गोरखाओं के अधीन हो जाता है। उसके उपरांत भी गढ़ की प्रजा की हालत में कोई सुधार नहीं होता, उनके पास अब भी न खाने को खाना और न तन ढ़कने को कपड़ा होता है। ऐसी स्थिति को देखकर मोला का संवेदनशील हृदय उद्वेलित हो जाता है और वे कांतिपुर दरबार के मुलक दीवान भीमसेन थापा का लिख भैजते हैं-

“गढ़ राज्य में भारदारों की लूट खसोट से प्रजा के पास तन ढकने को कपड़ा और पेट भरने को अन्न तक नहीं बचा है। गढ़ में जीवन बचेगा तो राजा रण बहादुर शाह का राज भी बचा रहेगा।” (पृ.255) यह मोला का लोकजीवन के प्रति समर्पित हृदय ही है जो उन्हें लोक कल्याण हेतु उद्वेलित करता रहता है। जिसकी अभिव्यक्ति उन्होंने अपनी कविताओं और चित्रों में की है। उनका जीवन मानव मूल्यों के साथ-साथ संवेदना की तलाश करता हुआ नजर आता है। इस प्रकार विचार, संवेदना और लोक-संस्कृति के साथ-साथ पहाड़ के जीवन को स्पर्श करता हुआ यह उपन्यास मोला राम को समझने का एक अनिवार्य पाठ है।

उपन्यास में गढ़वाल के प्राकृतिक सौंदर्य और वहाँ की संस्कृति को भी बड़ी खूबी से उकेरा गया है। सैनिक अमर सिंह थापा मोला राम की चित्रशाला में प्रवेश कर वहाँ लगे एक चित्र को देखकर पूछता है- “गढ़ राज्य के जीवन के अज्ञात रहस्यों को संकेतों प्रतीकों से खोलती इससे श्रेष्ठ शौर्य गाथा दूसरी नहीं हो सकती सेनापति! किंतु …””किंतु, सुंदर प्राकृतिक छटा के बीच ऊंचाई से गिरते झरने का रंग दूधिया की बजाय इतना गाढ़ा और सुर्ख…”(पृ. 24) इस पर मोला का उत्तर दृष्टव्य है-“यह गढ़ है, यहाँ की संस्कृति को भी इसमें भर दिया है। इसके बिना न जीवन पूरा होता है न चित्र ही। यहाँ का आनंद देता संगीत जो भाव विभोर कर देता है, जो सांसारिक तापों से विमुक्त कर देता है- इस धरती की मिट्टी, फूल-पत्तियों का उत्कृष्ट रंग ही गढ़ की कला है सैनिक!” (पृ.24)

इस प्रकार मोला ने अपनी तूलिका को रंगों में भिगोकर गढ़ राज्य के शौर्य, पराक्रम और वहाँ के लोक सौंदर्य को अपने कैन्वस पर उतारा था। उनके चित्रों में अपने राज्य, अपनी संस्कृति और पहाड़ी संवेदना की अभिव्यक्ति मिलती है। जैसा कि लेखक ने स्वंय स्वीकार किया है कि यह उपन्यास मोला राम के जीवन के एक विशेष काल खण्ड को लेकर चलता है। किंतु फिर भी मोला राम के व्यक्तित्व के अनछुए पहलुओं को उद्घाटित करता हुआ एक महत्वपूर्ण उपन्यास है जिसके सहारे महान कवि मोला राम के जीवन और उनके कला पक्ष को समझा जा सकता है। साथ ही यह एक ऐसा महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है जिसमें नेपाल नरेश रणबहादुर शाह द्वारा भैजे गए सैनिक अमर सिंह थापा द्वारा गढ़ को अपने अधीन करने हेतु मचाई गई लूट खसोट, स्त्रियों के साथ किए गए अमानवीय व्यवहार, सैनिको़ द्वारा सैकड़ो लोगो को मौत के घाट उतारना, गढ़ में परिवार का आपसी कलह, राजा प्रद्युम्न शाह के छोटे भाई द्वारा गढ़ का राजा बनने की चाह में मचाया गया उत्पात्, इस सत्ता संघर्ष का आम जन पर पड़े प्रभाव का यथार्थ चित्र प्रस्तुत कर उस समय के समाज की दुर्दशा और सत्ता की भूख की निरंकुशता का जीवंत वर्णन किया गया है।

जैसा कि हम कह आए हैं कि उपन्यास 21 भागों में विभक्त है। लेखक के कहन की शैली उपन्यास के विभिन्न काल खण्डों के अलग-अलग स्थानों को प्रस्तुत करती हुई चलती है। इससे उपन्यास की एक सूत्रता बाधित नहीं हुई है। शिल्प के इस रचाव में लेखक को सफलता मिली है। भाषा में सहजता, सरलता और स्वाभाकिता का गुण समाहित है। जिसके कारण उपन्यास की भाषा साहित्यिक स्पर्श के साथ-साथ विचार की सक्रियता का प्रमाण भी पेश करती है। जब हरिसुमन बिष्ट जी मोला के चित्रों का वर्णन करते हैं तो ऐसा लगता है मानो वे स्वंय एक चित्रकार हैं। किंतु लेखक की चित्रकारी कैन्वस पर तूलिका से नहीं अपितु कागज़ पर शब्दों के माध्यम से उभरती हुई नजर आती है। चित्रों का इतना सूक्ष्म विश्लेषण और रंगों की इतनी बारीक समझ लेखक के गंभीर अध्ययन का ही नतीजा हो सकती है। भाषा में एक ताजगी है। जो कि अपने विषय को साथ लेकर चलती है। भाषा का रूप व्यवहारिक है। जिसके कारण वह जीवंत हो उठती है। इस प्रकार मोला के चित्रों के माध्यम से गढ़ राज्य के प्राकृतिक सौंदर्य, गढ़ नरेशों के शौर्य-पराक्रम और गौरवशाली इतिहास को जानने और समझने की गाथा का प्रभाव पूर्ण शैली में चित्रण किया गया है।

निष्कर्षत: इस उपन्यास में मोला राम के जीवन के एक विशेष कालखंड को आधार बनाकर गढ़ राज्य में सत्ता की भूख के कारण पारिवारिक कलह से उपजे आपसी संघर्ष और गोरखा सैनिकों द्वारा मचई गई लूट को रेखांकित करते हुए आम जन के समस्त संकटों, चुनौतियों और विपदाओं का यथार्थ अंकन हुआ है। इस कृति की सबसे बड़ी विशेषता है कि यह केवल उपन्यास नहीं है अपितु मोला के व्यक्तित्व और उनकी कला को समझने, पारिवारिक मनमुटाव के चलते राजा प्रद्युम्न शाह और उनके अनुज कुंवर पराक्रम का सत्ता हथियाने की ललक में आम जन का शोषण, गोरखा सैनिकों द्वारा इसे अवसर समझकर गढ़ राज्य को अपने नियंत्रण में करने के लिए रचे षड्यंत्र का ऐतिहासिक सत्य है। इस प्रकार गढ़ और कुमाऊँ की सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों को उद्घाटित करता हुआ यह एक महत्वपूर्ण और गंभीर उपन्यास है।