कपाट खुलने से पहले तुंगनाथ धाम में सैलानियों की आवाजाही से स्थानीय लोगों के आक्रोशित होने के मायने!

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अभिषेक पंवार ‘गौण्डारी’

जब तौऽळी बौऽगैलि बल,तब औऽली अक्कल।

क्यों? क्यों?और क्यों?

प्रिय

संभ्रांत् तुंङ्गनाथ घाटी,

कुछ लोग पर्यटक नहीं होते हैं वे मैदानों की गंदगी हैं। शीतकाल में कपाट बंद के समय भी पर्यटक उक्त क्षेत्र में क्यों? मण्डरा रहें हैं, यह यक्ष प्रश्न है। पवित्र तुङ्गेश्वर क्षेत्र धार्मिक स्थल है न कि पर्यटक स्थल-इसे समझें। छःमाह शीतकालन में कपाट बंद के समय देवालय के गर्भगृह में स्थित भगवान महादेव के लिङ्ग स्वरूप को समाधिस्थ करने का कोई औचित्य नहीं है क्या?

 हमें शीतकाल में इस पवित्र भूमि से मानवीय गतिविधियों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना चाहिए ताकि आवश्यक तरङ्गरुपी पवित्रता बनी रहे।इस स्थान को छः माह शीतकाल में सांस लेने दें ताकि यह तरङ्गरुपी पवित्रता इस क्षेत्र में अक्षुण्ण रुप में बनी रहे। ग्रीष्मकाल में यह पवित्र तुङ्गेश्वर क्षेत्र धार्मिक यात्राओं और दर्शनार्थियों के लिए युगों-युगों तक ऐसे ही शाश्वत और अक्षुण्ण रुप में यथास्थान स्थित रहेगा। क्यों? पौराणिक परम्पराओं का खुले आम हनन होता आ रहा है। ऐसे कृत्यों का भविष्य नकारात्मक होता है।

“षड्मासे पूज्यते देवा:, षड्मासे मानवा स्थिता”- इति पुराण वर्तते। हिमालय स्थित सभी देवालयों के लिए यह उक्ति प्रासंगिक होनी चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि ऐसी पवित्र भूमि धार्मिक स्थल से परिवर्तित होकर पर्यटक स्थल का नाम धारण कर ले क्योंकि भौतिक दुनिया इसी ओर अग्रसर है। चोपता मिनी स्वीटजरलैंड माना जाता है परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि पर्यटक एक तीर से दो निशाने लगाए-मीनी स्वीटजरलैंड भी घूमे और इस पवित्र तुङ्गेश्वर क्षेत्र भी।  

शीतकाल में कपाट बंद के समय इस क्षेत्र में जाने से प्रतिबंध लगाना चाहिए जो कि भविष्य में मानवीय अनुशासन का परिचायक होगा‌।स्थानीय लोगों को प्रशासन से मिलकर कठोर निति- नियमों की पौथी बनानी चाहिए और इनका पुरजोर पालन करवाना चाहिए। इस संबंध में स्थानीय लोगों की उदासीनता वर्तमान और भविष्य को खतरे में डालने जैसा है,हम अपनी धार्मिक पहचान खो देंगें। चंद्रशीला के लिए शीतकालीन एक वैकल्पिक मार्ग की व्यवस्था पर गहन विचार किया जाना चाहिए जिससे पर्यटन पर भी असर न पड़े और तुङ्ग क्षेत्र की पवित्रता भी बनी रहे। यकीन माने मानव ने अपने मानवीय हस्तक्षेप से कयी पवित्र स्थलों को मैला किया है।-

बाकि तुङ्ग क्षेत्र के बारे में-

मान्धातृक्षेत्रतो याम्ये योजनद्वयविस्मृतम्। द्वियोजनसमायातं सर्वकामफलप्रदम्।

तुङ्गनाथं शुभक्षेत्रं पापघ्नं सर्वकामदम्।

यद्दृष्ट्वा सर्वपापेभ्यो विमुक्तो लभते शिवम्।

हे! तुङ्गेश्वर नमस्तुभ्यं।

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