कुमाउनी भाषाक ठुल धुंगार खोल बैर उज्याव दिखौंणि छि मठपाल ज्यू

0
2242
चारु तिवारी

कुमाउनी भाषा और साहित्य कं अपण अमूल्य योगदान दिणीं मथुरादत्त मठपाल ज्यूक यूं कुछ कविता उनर पुर जीवन दर्शन और रचनाक फलक क जांणना जिली भौते छन। हम जास कतुकै नानतिनालै उनरि भाषा प्रति समर्पण और रचना-यात्रा बै बहुत कुछ सीखो या कै सकनुं कि उनर स्योव कं चै-चै बैर अघिल हिटण्ंाक शगूर सिखो। उनु दगै पैलि मुलाकात कब है यो तो भलि कै याद न्हां, लेकिन उनर साहित्य और उनर परिवार दगै भौत पुराण परिचय भौय। आजकल क ना, भौत पुरांण। इतिहासक पन्नो बै। आजादीक आंदोलनक दौर बटिक। उनर गौं नौला क आंदोलनकारियों बारम मुहावरा बन गौइ कि ‘नौला के रणबांकुरे।’ उनर बौज्यूक आजादीक आंदोलन म भौते ठुल योगदान छी। म्यारा जसा नई पीढ़ी लोगन कं लै उनर बौज्यू हरिदत्त मठपाल ज्यू अपाण गौं-गाडाक जस लागनैर भाय। यैक एक कारण य लै भय कि हमार इलाक दुरहाटक कफाड़ क्षेत्र म एक गौं छू उभ्याड़ि। यां आजादीक आंदोलनक दौर म 1939 म एक भौते ठुल सम्मेलन हो। वीक नाम छि ‘विमलानगर सम्मेलन।’ य सम्मेलन कांग्रेसक भितैर समाजवादी विचारधाराक नेताओं ल करा। य सम्मेलन में देशाक भौते ठुल-ठुल समाजवादी नेता शामिल हाय। जमै मुख्य अतिथि तौर पर सेठ दामोदरस्वरूप और आचार्य नरेन्द्र देव ज्यू यां आईं। सम्मेलनैक अध्यक्षता हरिदत्त मठपाल ज्यूल करि।

आाजदीक बाद म पाली पछाऊं में सामाजिक और शैक्षिक उत्थानाक लिजी उनर काम कं आज तक लै याद धरि जां। सल्टक मानिला इण्टर कालेजक स्थापना म हरिदत्त मठपाल ज्यूक भौते ठुल योगदान छू। मथुरादत्त ज्यूक भै डाॅ. यशोधर मठपाल ज्यू क पहाड़क संस्कृति, इतिहास, पुरातत्व, कला और साहित्य म विशेष योगदान छू। उनकूं देशक प्रतिष्ठित पद्मश्री सम्मान लै मिलो। हम सब लोग मथुरादत्त मठपाल ज्यूंक कई संदर्भों म जाणनैर भाय। कुमाउनी भाषा और साहित्यक प्रचार-प्रसार म उनर योगदान अपण आप म भौते अलग छू। सबूहैं बै अलग। जब लै कुमाउनी भाषा-साहित्यैक बात होलि तो मुथरादत्त ज्यूक नामक बिना उ अघूर रौल। हम सब लोग कुमाउनी भाषा और साहित्याक युग पुरुष कं आपण विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करनूं। उनर रचनात्मक योगदान हमुकं हमेशा बाट बताल, उज्याव दिखाल।

मथुरादत्त मठपाल ज्यूक जन्म 29 जून, 1941 क दिन अल्माड़ जिल्लक भिकियासैंण क नौला गांव में हौ। उनर बाबू हरिदत्त मठपाल ज्यू प्रखर स्वतंत्रता संग्राम सैनानी छि। इजक नाम कांन्ति देवी मठपाल छि। उनूल आपण शुरुआती शिक्षा स्थानीय स्तर पर करणां बाद तीन विषयों म एमए करो। उनूल आपण सेवा शिक्षा विभाग में दे। लगभग पैतीस साल माध्यमिक शिक्षा म पडौणं क बाद उनूल 1997 म स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति ल्है। उनूल आपणं लेखन हिन्दी भाषा बै शुरू करौ। उनार कतुक कविता और कहानि पैली हिन्दी मजै छपिं। मथुरादत्त ज्यूल आपण कुमाउनी म लेखन 1982 बे नियमित शुरू करौ। जब बै उनूल कुमाउनी म लेखण शुरू करौ आपण रचनात्मक कैनवास लै भौते ठुल बना। कतुक किस्माक लेखन म आपुक स्थापित करो। उनूल विशेषकर कुमाउनी भाषाक कतुक ऊंण-कुंण चाईं जो कभैं लोगनक नजरों में नि ये पाई। कुमाउनी प्रति एक विशेष लगाव पैद करणंक माहौल लै बना। मठपाल ज्यू ल हिन्दी में एक काव्य संग्रै और कुमाउनी म पांच कविता संगै्र प्रकाशित कराईं। उनूल मुक्त छंदक दगाड़ लगभग तीस छंदोक प्रयोग करौ। उनार कुल अठारह पुस्तक प्रकाशित हयीं। उनूम ‘आङ-आङ चिलैल हैगो’, ‘पै मैं क्याप-क्याप कै भैटुनुं’, ‘फिर प्योलि हंसे’, ‘मनखि सतसई’, ‘था मेरा घर भी यहीं कहीं’ (चन्द्रकुंवर बत्वार्ल क कविताओंक कुमाउनी अन्वार), ‘गोमती-गगास’, ‘अनपढ़ी’(शेरदा अनपढ़ कविताओं का हिन्दी अन्वार), ‘हम पीर लुकाते रहे’ (हीरासिंह राणा क कविताओंक हिन्दी अन्वार) छन।

मथुरादत्त ज्यूक अनुवाद, निबंध, आलेख, कहानी, नाटक और कविता कतुक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हौनै रईं। उनूल कुमाउनी भाषाक प्रचार-प्रसार और वीक साहित्य कं लोगों तक पहुंचैंणा लिजि आपण पूर जीवन खपै दै। यैक लिजी उनूल आपंण भौते छोटि पेंशन बटी डबल निकाल बैर ‘रामगंगा प्रकाशन’ नामैल एक संस्था क गठन करौ। यैक माध्यमैल उनूल करीब पच्चीस किताबौंक प्रकाशन करौ। उनर य कोशिश लै भौत सारे उन लिख्वाडों कं लै मौक मिलौ जनुकं क्वे नि पछ्यांण राछी। उं बाद मं कुमाउनी लेखनाक ठुल नाम मानी गईं। उनर प्रयासों ल नई लिख्वाडों कं ले भौत मौक मिलीं। उनूल लेखणक अलावा कुमाउनी भाषाक प्रचार-प्रचार और उकैं जन-जन तक पहुचैंणक लिजी अलग-अलग किस्मांक आयोजन लै करीं। उनूल 1989, 90 और 91 में तीन ठुल कुमाउनी भाषा सम्मेलन लै कराईं। एक जो भौते ठुल काम उनूल करौ उ छू कुमाउनी और गढ़वाली भाषाक कवियोंक कविताओं क हिन्दी म अनुवाद। मथुरादत्त ज्यूल प्रकृतिक सुकुमार कवि चन्द्रकुवंर बत्र्वाल ज्यूक कविताक जां कुमाउनी म अनुवाद करो वैं हीरासिंह राणा, शेरदा अनपढ़, गोपालदत्त भट्ट कृपालदत्त जोशी और चन्द्रबाबू तड़ागी क कविताओं क हिन्दी म लै अनुवाद करौ।

मथुरादत्त ज्यूक एक और सबूहैं ठुल काम य छि कि उनूल 2000 बटिक कुमाउनी भाषाक विकासक लिजी ‘दुदबोलि’ नामैक पत्रिकाक प्रकाशन शुरू करो। य पत्रिका कुमाउनी भाषा और साहित्यक एक ठुल धुंगार खोलणंक काम करो। जां बैटि हम पौर भितैरपन अन्यार म पड़ि भौते चीजों को देखि सकछि। बाद म पत्रिका ल हमारा साहित्याक इग्दैरी और द्वार लै खोलि दी। तबै कुमाउनी रचनाकारों चार हजार है बैर ज्यादा पन्नौंक सामग्री हमूंक देखण म अै। मथुरादत्त ज्यूक कुमाउनी भाषाक प्रति समर्पण कं य रूप मैलै देख सकनूं कि लंब समय बै आपंण खराब स्वास्थ्यक बावजूद उनूल आखिर टैम पर लै कुमाउनीकि अस्सी सालौंकि कथा जात्रा पर एक महत्वपूर्ण संग्रै निकालो। जैकैं समय साक्ष्य प्रकाशनैल ‘कौ सुआ, क्ाथ कौ’ नामैल प्रकाशित करो। कुमाउनी साहित्य म उनर योगदान कं देखि बैर भौत प्रतिष्ठित पुरस्कार उनकूं मिलीं। उनूकं 2014 में साहित्य अकादमी ल आपण प्रतिष्ठित भाषा सम्मानैल सम्मानित करौ। हम लोगोंल ‘क्रियेटिव उत्तराखंड-म्यर पहाड’ क तरफ बै जब शेर सिंह बिष्ट ‘अनपढ़’ ज्यूक पैल पुण्यतिथि हल्द्वाणि म मनैछ तो उ म मथुरादत्त ज्यूं क सम्मानित करौ। हम सब लौगनाक लिजी मथुरादत्त मठपालज्यू क निधन कुमाउनी भाषा और साहित्यक एक युग क अवसान छू। हम हमेशा आपुण देई भाषा-साहित्यक छिलुकक उज्याव म अघिल हिटणैंक कोशिश करूल। हम सबौं तरफ बै विनम्र श्रद्धांजलि।