Harisuman Bisht Play Mola:-नाटक के विविध तत्वों के आधार पर हरिसुमन बिष्ट रचित ‘मोला’ नाटक का विश्लेषण

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खीमानन्द बिनवा

‘मोला’ हरिसुमन बिष्ट जी का एक श्रेष्ठ नाटक है। यह नाटक वर्ष 2023 में साहित्य सहकार प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है। 120 पृष्ठों के इस नाटक में बिष्ट जी की निर्दोष नाट्य कला के दर्शन होते हैं। यह नाटक रंगमंच एवं कलात्मकता दोनों ही दृष्टियों से श्रेष्ठ नाटक है। इस नाटक की कथा ऐतिहासिक होते हुए भी सरल एवं स्पष्ट है। नायक के नाम पर नामित यह नाटक कल्पना और इतिहास का मिश्रण प्रस्तुत करता है। इस नाटक को पढ़ने के पश्चात् नाटक के तत्वों के आधार पर इसकी जो विशेषताएँ उभर कर आती हैं, इस प्रकार हैं-

लेखकः- डॉ.हरिसुमन बिष्ट

1. कथानक

‘मोला’ का मूल कथानक ऐतिहासिक है,इसमें बिष्ट जी ने अपनी कल्पना द्वारा कई रोचक प्रसंगों की सृष्टि भी की है। लेखक ने नाटक के कथानक का मुख्य आधार गढ़वाल के शाह वंश को बनाया है।

कथानक की शुरुआत महाराज प्रद्युम्न के बलिदान होने की सूचना से होती है। इसके उपरांत नेपाली सेनापति अमर सिंह थापा कवि मोला की कला का मुरीद होकर परितोषित ग्रहण करने का अनुरोध करता दिखाई देता है। कथा की शुरुआत गोरखा सेना के सरदार गंगा राम के अपनी खुकरी से संन्यासिनी सोमा के स्तन काट देने और संन्यासिनी सोमा द्वारा उसी खुकरी से उसकी हत्या देने से होती है। कुंवर पराक्रम सोमा को गिरफ्त में लेकर उसकी पहरेदारी को सिपाही कीर्तिसिंह को पास छोड़ जाता है। कीर्तिसिंह सोमा के घाव पर मरहम लगाता है। मोला सोमा के आश्रम में मिलने जाता है। तीनों श्रीदरबार को प्रस्थान करते है। वहाँ कुंवर पराक्रम शाह उन तीनों को बंदी बना लेता है। सोमा को विश्राम कक्ष में ले जाता है। इस समय ही गोरखाओं का आक्रमण होता है। मोला चित्रशाला में चित्रकार चौतू से सोमा को नहीं छूटा पाने का अफ़सोस करता है और गोरखाओं के साथ खड़ा रहने की बात करता है।

महाराज प्रद्युम्न को वजीर जयदेव बताता है कि कुंवर पराक्रम ने सेनापति अमरसिंह थापा से मिलकर पंडित हर्ष देव जोशी को कैद कर लिया है। सुब्बा नरशाह कुमाऊं में नगरकोटियों की बसोबास में धावा बोलकर उनको मौत के घाट उतार देता है।

कुंवर अपने सैनिकों के साथ श्रीदरबार में आता है और महाराज प्रद्युम्न को धमकाकर गढ़ राज्य के दो हिस्से करने के प्रस्ताव पर हामी भरवा देता है। कुमाऊं का नेपाली शासक बमशाह अपने सहायक और सुरक्षाकर्मियों के साथ बधाणगढ़ी आकर महाराज प्रद्युम्न से मिलता है और गढ़ पर भी साम्राज्य स्थापित करने की बात कहता है। महाराज प्रद्युम्न रात्रि में ही वहाँ से भाग निकलते है जिस पर महारानी मंदाली इसे अपमानजनक बताती है। नेपाल नरेश का संदेश वाहक पराक्रम को गढ़ सिंहासन छोड़ने का नरेश का आदेश सुनाता है।

मोला देवचेली बस्ती में जाता है जहाँ उसकी भेंट सोमा से हो जाती है। सोमा बताती है कीर्ति सिंह ने कुंवर की आरामगाह से उसे मुक्त किया पर, वह नहीं रहा। सलाण क्षेत्र में ग्रामीण मोला को उसके उपकारों के लिए राजा महाराजा से भी बड़ा बताते है। नगर में महाराज प्रद्युम्न की मृत्यु की ख़बर लहरा जाती है। सोमा गंगा के निकट कीर्तिसिंह की हत्या का बदला लेने के लिए नेपाली सेनापति मैनसिंह थापा और सिपाहियों पर गोलियाँ चला देती है।

सर्वोच्च सेनाधीश के आदेश पर हस्तिदल मोला के पास आकर बताता है कि मुझे निर्देश हुआ है, मैं गणिका लछमी को आप तक पहुँचा दूं। सुब्बा बताता है कांतिपुर मोला की कविताओं का मुरीद है। नेपाल नरेश रणबहादुर शाह इस मौके पर आपका सम्मान करना चाहते हैं,साथ चलने को कहता है। मोला नेपाल जाता है और नेपाल नरेश के अनुरोध पर प्रशस्तिपरक कविताएँ सुनाता है। जिससे प्रसन्न होकर नरेश द्वारा मोला को एक लाख के पारितोषिक,भारदारों द्वारा रोकी गयी जागीर की लाल मुहर की सनद और दैनिकवृति भी वापिस दे दी जाती है। श्रीदरबार में मोला को गोरखा सेनापति नैन सिंह थापा  द्वारा बंदी संन्यासिनी सोमा निर्दोष मानते हुए मुआफ़ करने की खबर मिलती है। नयी व्यवस्था न्याय देने में विफल हो गई, इसके उलट गढ़वाल में गोरखाओं के अत्याचार बढ़ने लगे। दुखी मोला कांतिपुर दरबार को पत्र लिखते हुए गढ़वाल की प्रजा को न्याय,उनके जीवन में शांति,सुख और समृद्धि लाने को जीवन का उद्देश्य बनाने का संकल्प लेता है।

इस प्रकार इस नाटक का कथानक अत्यंत संक्षिप्त,कौतूहलपूर्ण एवं नाटकीय है। घटनाओं से भरपूर इसकी कथा में हर समय हलचल और सक्रियता का वातावरण बना रहता है। लेखक ने नाटक में इतिहास से इतर कुछ प्रसंग जैसे- गंगा सिंह और संन्यासिनी सोमा का प्रसंग,कीर्ति सिंह और सोमा का प्रसंग,मोला और सोमा के प्रेम प्रसंग का समावेश कर अपनी कल्पना के रंग भर दिए है,जिससे कथानक सजीव के साथ अधिक रोचक भी हो उठा है।

2. पात्र और चरित्र चित्रण

किसी भी नाटक की सफलता में उसके पात्रों का बहुत बड़ा योगदान होता है। पात्रों के द्वारा ही नाटककार अपने भावों की अभिव्यक्ति पाठक तक पहुँचाता है। पात्रों की दृष्टि से मोला एक सफल नाटक कहा जा सकता है। बिष्ट जी के इस नाटक में पात्रों की भीड़ हैं। इनमें मुख्य पात्र मोलाराम,प्रद्युम्न शाह,पराक्रम शाह,सोमा,रण बहादुर शाह, मंदारिन,सुचरिता,चैतू,माणकू,अमर सिंह थापा,बमशाह,कीर्तिसिंह,कृपाशंकर,लछमी,ज्वाला राम,अजब राम,जयदेव डोभाल,धरणीधर,नैन सिंह थापा,रामदत्त,गंगा राम और चकड़ैत आदि हैं।

बिष्ट जी ने इन सबका चरित्र-चित्रण बहुत ही सजीव एवं स्वाभाविक तरीके से किया है। चूंकि यह नाटक नायक प्रधान नाटक है, और मोला इसका नायक है तथा वही इस नाटक में आदि से अंत तक छाया रहता है, अतः लेखक ने उसके कलाकार, चित्रकार और कवि के गुणों को उभारा है। इसी प्रकार लेखक ने सोमा के चरित्र को भी बहुत सुंदर व्यक्तित्व प्रदान किया है तथा उसे नायिका के रूप में चित्रित किया है। सोमा संन्यासिनी होते हुए भी अपनी रक्षा में गंगा राम की हत्या और कीर्तिसिंह की हत्या का बदला लेने के लिए गोरखा सैनिकों पर गोलियाँ चला देती है। यह पात्र ही नायक मोला की प्रेरणा बनती है। मोला की पत्नी सुचरिता है। इसके अलावा प्रद्युम्न शाह और बहादुर शाह को कला और साहित्य प्रेमी दर्शाया गया है तथा पराक्रम शाह का चरित इसके विपरित है। पराक्रम शाह और गंगा राम को बिष्ट जी ने खलनायक के रूप में चित्रित किया है। साथ ही प्रस्तुत नाटक में लेखक ने तीन काल्पनिक पात्रों-संन्यासिनी सोमा, सिपाही कीर्ति सिंह और गोरखा सैनिक सरदार गंगा राम को भी जीवन्तता प्रदान की है। इस प्रकार यह भी कहा जा सकता है कि चरित्र चित्रण के आधार पर भी यह एक सफल नाटक है।

3. कथोपकथन

‘मोला’ नाटक का संवादों के माध्यम से अध्ययन करने पर हम इसे अत्यंत सफल पाते है। इस नाटक के संवाद सरल, सहज व स्वाभाविक हैं और कथानक को गति प्रदान करते हैं। बिष्ट जी ने छोटे-छोटे रोचक संवाद लिखे है। सभी संवाद भावानुकूल एवं पात्रानुकूल हैं। बिष्ट ने नाटक में एकालाप का प्रयोग किया है। नाटक के दृश्य-4 के शुरुआत में मुख्य पात्र मोला एकलाप करता दिखाई पड़ता है। यहाँ एकालाप में मोला बातचीत कर रहा है। वह एक ही लंबे प्रारूप में बोल रहा है और दर्शक राज्य में फैले अशांति भरे माहौल को उसके शब्दों की आंखों से देखते हैं। नाटक के अंतिम दो दृश्यों-46,47 में पात्र मोला और उद्घोषक के लंबे संवाद भी आते है जो कथानुकूल है। लेखक ने एक जगह स्वगत भी दिया है। दृश्य-18 में मोला के आंतरिक भावों को स्पष्ट करते हुए स्वगत बुदबुदाने का वर्णन किया है। इस प्रकार नाटक के संवाद अत्यंत प्रभावशाली बन पड़े हैं। नाटक के कुछ संवाद दृष्टव्य हैं-

पहरुआ: पुल के रस्से काट दिए हैं मालिक! उस तरफ नहीं बढ़ें।

मोला: किसने किसने काटा? पुल तो कुछ महीने पहले ही बांधा था।

पहरुआ: क्या बताऊँ मालिक! पुल तो उतरता है और चढ़ता रहता है आए दिन। यह कोई नयी बात नहीं है। सड़क कटती रहती है और बंद होती रहती है, यही काम रह गया है इस गढ़ में मरना तो हम जैसे लोगों को है।

बिष्ट ने क्षेत्रीयता का स्पर्श देते हुए गढ़वाली भाषा में भी संवाद लिखे हैं-

ठग-1: तू भी ठग तो रे?

मोला: जी

ठग-2: तू हमारी मदद कर ली?

मोला: हाँ जी ज़रूर!

चर्चा के संवादों की समाप्ति पर इनका हिंदीनुवाद कर दिया गया है।

4. देशकाल और वातावरण

देशकाल और वातावरण नाटक का एक प्रमुख तत्व होता है। देशकाल और वातावरण के अंतर्गत लेखक नाटक के समय उन क्षेत्रों के नाम,उस समाज की भाषा अथवा बोली (कुमाऊंनी,गढ़वाली और नेपाली),नाटक पात्रों की वेशभूषा,उनके रहन-सहन,लोक गीतों,परंपराओं,संस्कृति,गायन शैली,शुभ-अशुभ की मान्यताओं,लोक किदवंती,लोक व्यंजनों,लोक देवी-देवताओं,न्योली (मंगल गीत),तत्कालीन रीति-रिवाज़,आवागमन के साधनों (सैनिकों का घोड़ों में आना) इत्यादि का वर्णन करता है। लेखक समय और स्थान के यथायोग्य वर्णन के द्वारा ही नाटक को प्रभावशाली बनाता है। इससे ही नाटक में सजीवता आती है। ऐतिहासिक नाटकों में देशकाल और वातावरण का वर्णन करते समय लेखक को विशेष संवेदनशीलता बरतनी पड़ती है क्योंकि पाठक वर्ग को इसका पूर्वज्ञान होता है। लेखक ने कथा,समय और स्थान का वर्णन कर के नाटक को महत्वपूर्ण और प्रभावशाली बनाया है।

बिष्ट जी का यह नाटक गढ़वाल रियासत के शाह वंश से संबंधित है। महाराजा प्रद्युम्न शाह का शासन काल 1786-1804 माना गया है। इतिहास में गोरखाओं के आक्रमण का समय 1803 रहा। इस युद्ध में प्रद्युम्न शाह वीरगति को प्राप्त हुए। इस नाटक में लेखक ने उस समय के राजनीतिक दांव-पेंच के अतिरिक्त राजपरिवारों की आंतरिक कलह का वर्णन किया है।

लेखक ने नाटक में तत्कालीन वातावरण की सृष्टि करने हेतु गढ़वाली-कुमाऊंनी बोली के संवादों,पात्रों के नाम,अस्त्र-शस्त्र (खुकरी, बंदूक),चित्रशाला की सजावट,श्रीदरबार का सुंदर चित्र,वेणीताल आश्रम के भोर का दृश्य,तूलिका से चित्र उकेरना आदि का वर्णन किया है। इससे तत्कालीन वातावरण सजीव हो उठा है।

5. संकलनत्रय

इस नाटक में स्थान,समय और कार्य के संकलन-त्रय का पूर्ण रूप से निर्वाह किया गया है। नाटक में दृश्यों की संख्या 48 है। इस नाटक की सभी घटनाएं कुल आठ स्थानों में घटित हुई हैं। घटनाक्रम लगभग दो हफ्तों के भीतर का है, लेकिन नाटक के अंतर्गत उनमें से भी चार-पांच दिनों को ही दर्शाया गया है। इस नाटक का मुख्य कार्य गढ़वाल के राजघराने से आपसी संघर्ष के कारण गढ़ में गोरखाओं का राज स्थापित होना तथा राज बदलने के बाद भी जनता पर अत्याचार न रुकने से आहत मोलाराम का गढ़वाल की प्रजा को न्याय, उनके जीवन में शांति, सुख और समृद्धि लाना जीवन का उद्देश्य बना लेना है।

6. उद्देश्य

‘मोला’ नाटक एक उद्देश्यपूर्ण रचना है। इसमें बिष्ट जी ने एक कलाकार,चित्रकार,कवि मोला के जनता के हितैषी के रूप में कार्य करने की कामना की है, जो जनता की आवाज़ बनने और उस आवाज़ को बुलंद करने की क्षमता रखता है। दूसरी ओर संन्यासिनी सोमा द्वारा अपनी अस्मिता की रक्षा हेतु हत्या करना नारी सुरक्षा के लिए नया दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। मोला नाटक में आधुनिकता भी दिखाई देती है। बिष्ट का उद्देश्य कलाकारों के खोए वैभव को वापस लाना भी है। वे नाटक में कलाकार की कला का महत्व स्पष्ट करते है और बताते है जो समाज अपने कवि,कलाकारों का सम्मान नहीं करता,वह कभी समृद्ध नहीं हो सकता। उसका प्राचीन सांस्कृतिक वैभव जल्दी ही ख़त्म हो जाता है।

इसके साथ ही बिष्ट ने राष्ट्र के अंदर आंतरिक कलह और सत्ता हासिल करने के लिए आपसी झगड़ों से होने वाले नुकसान और विदेशी ताकतों द्वारा इसका फायदा लेने के प्रति भी सचेतना जागृत करने का प्रयत्न किया है।

7. अभिनेयता

इस नाटक में छोटी-सी ऐतिहासिक कथा को लिया गया है,जो संक्षिप्त है। ऐतिहासिकता आधारित नाटक में पात्रों की अधिकता स्वाभाविक है। जयशंकर प्रसाद के नाटकों में भी यह हमें दिखाई देता है।

स्थानों की संख्या चित्रशाला,वेणीताल आश्रम,श्रीदरबार,गणिका लछिमी का घर,गंगा का किनारा,बधाण गढ़ी,देवचेली बस्ती,कान्तिपुर नेपाल कुल आठ है। संवाद छोटे-छोटे लिखे गए है। सरल भाषा का प्रयोग किया गया है। नाटक के मंचन को सफल बनाने के लिए क्षेत्रीय बोलियों के संवाद का हिंदी अनुवाद भी दिया गया है।

इन सब के आधार पर कहा जा सकता है कि यह नाटक अभिनेयता या रंगमंच की दृष्टि से सफल नाटक बन पड़ा है।

8. भाषा-शैली

‘मोला’ नाटक में लेखक ने बोलचाल की हिंदी भाषा का प्रयोग किया है। नाटक के कथानक को क्षेत्रिय रंग देने के लिए गढ़वाली,कुमाऊंनी और नेपाली भाषा के संवादों का प्रयोग भी हुआ है। चूंकि बिष्ट जी पहाड़ी पृष्ठभूमि से है, उनका बचपन पहाड़ी क्षेत्र में गुजरा है तो वे कुमाऊंनी भाषा पर स्वाभाविक रूप से अपना अधिकार रखते है। बिष्ट को गढ़वाली और नेपाली भाषा का भी अच्छा ज्ञान है, जो नाटक में उभरकर सामने आया है।

इस नाटक में वीर, भक्ति, वीभत्स, करुण और भयानक आदि रसों का प्रयोग स्थिति अनुरूप हुआ है। लेखक ने नाटक को ‘जैसा राजा वैसी ही प्रजा’, ‘गोरखा से गोरख्याणी’ आदि मुहावरों के प्रयोग से अत्यंत रोचक और रमणीय बना दिया है।

 नाटक में ‘हुक्म’,’मुनादी’,निहार,परदाज़,आदि उर्दू शब्दों के प्रयोग के साथ-साथ तडा-तोमड़ी,उचाट आदि देशज शब्दों का समावेश भी किया गया है। नाटक में कुछ वाक्य व्यंग्य प्रधान भी है। नाटक में अभिधा,लक्षणा और व्यंजना तीनों शब्द शक्तियों के साथ ही भाषा में ओज,माधुर्य और प्रसाद गुण सर्वत्र दिखाई पड़ते है। नाटक की भाषा सरल,सहज,प्रवाहमय और पात्रानुकूल है। नाटक के तत्वों के आधार पर यह एक सफल नाटक कहा जा सकता है।

नाटक में लेखक ने स्थान-स्थान पर काव्यात्मक व अलंकृत शैली एवं गीतों का प्रयोग कर अपने कवि होने का भी परिचय दिया है। इनकी भाषा नाटक के पात्रों की मनोवृत्ति, उनके भावों-विचारों और कार्य-व्यापारों के सर्वथा अनुकूल है।

अतः इन सभी से स्पष्ट है कि ‘मोला’ नाटक संवेदना अभिव्यक्ति और नाट्य-शिल्प दोनों ही धरातलों पर हिंदी साहित्य का एक सफल नाटक है।

लेखकः- खीमानन्द बिनवाल

शोधार्थी, हिंदी साहित्य

krnbinwal@gmail.com

जजफार्म,हल्द्वानी (नैनीताल)