तितली,मधुमक्खी सा हो जीवन,कोई प्रतियोगिता नहीं,पूरा परफेक्शन

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वर्षा सिंह

आजकल रोज़ 11 बजे वाली नरम कड़क धूप में बरामदे में बैठकर नाश्ता करती हूँ। घर के अंदर जुराबों की गर्माहट में तसल्ली महसूस करते पैर यहाँ सीधी धूप सेंकना पसंद करते हैं। सामने हरी झाड़ियों की छोटी सी बाउंड्री सरीखी है। जो सीमेंट की सीढ़ियों और मिट्टी की क्यारियों के बीच हरी दीवार का सा काम करती है। इन पर नन्हे बैंगनी रंग के खूब फूल खिले हैं।

ये नन्हें फूल छोटी मधुमक्खियों का ख़ज़ाना हैं। पूरे दिन वे इनसे रस निकालने की ज़िम्मेदारी बखूबी निभाती हैं। पूरी तन्मयता और लगन से वे अपनी कुदरती ज़िम्मेदारी को निभाती हैं। कोई शिकायत नहीं। कोई प्रतियोगिता नहीं। कम से कम हमें यही समझ आता है।

यहीं राई के पौधे भी अपनी पौष्टिक पत्तियों को ज़मीन के नज़दीक छोड़ आसमान की ओर पूरी ताकत से बढ़ चले हैं। इन पर पीले फूलों की बहार छाई है। ये रंगत यहाँ की तितलियों को बहुत पसंद है। सुनहरे भूरे परों वाली, सफ़ेद परों वाली, कभी नीले पैरों वाली तो अलग अलग सम्मोहक रंगों वाली तितलियां भी इन फूलों का स्वाद लेती हुई परागण की प्रक्रिया निभाती हैं। यहाँ भी कोई होड़ नहीं है। बेफिक्री है। ईमानदारी है। और अपने होने को जीना है। धूप बारिश बादल तूफ़ान को जीना है।

यहीं लीची का पेड़ भी सुस्ता रहा है। अगले सीजन के फल आने में अभी समय है। उसका इतवार बहुत लंबा होता है। तभी तो रसीले फल देता है। उसकी सबसे ऊंची शाख पर एक चिड़िया बड़ी देर से बैठी है। पर उकताई नहीं लगती। मगन है।

मैं सोचती हूँ कि मुश्किलें मेरे जैसे इंसानों के साथ ही हैं। हर समय कुछ छूट रहा होता है। करना कुछ होता है। मन कुछ और करने का होता है। हर तरफ़ होड़ सी मची है जिससे हम खुद को खींचकर बाहर निकाल नहीं पाते। उलटा उस होड़ में आगे निकलने की पूरी कोशिश करते हैं। फिर अपने बच्चों को भी कड़ी प्रतियोगिता के लिए ही तैयार करते हैं। दिन रात एक से चक्र में गुंथे हैं। पैसा जीवन पर हावी है। प्रेम, सम्मान सब पैसे से ही हासिल है।

एक तितली अभी बिलकुल मेरे पास से गुजर कर गई। नौकरी कर रहे व्यक्ति के पास तो इतना सोचने की भी फुर्सत नहीं। उनका एक इतवार बड़ा बेईमान होता है। नौकरी गवाने का डर हर समय हावी।  अब मुझे धूप छोड़नी होगी। इतना कुछ लिखने के लिए कई काम पीछे छोड़ दिये।