मसूरी अतीत के आईने में

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हेम चंद्र सकलानी

आदिकाल से मानव अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए नये-नये स्थानों की खोज करता रहा। जहाँ उसे अच्छा लगा, सुन्दर लगा, आवश्यकताएं आसानी से पूरी होती रहीं, वहीं वह बसता रहा। अंग्रेजों ने भारत पर लगभग 190 वर्ष राज किया। इसमें शक नहीं कि उनकी गुलामी में देश को भंयकर कठिनाईयों और शोषण के दौर से गुजरना पड़ा। यद्यपि अंग्रेज न हमसे बहादुर,न योग्य,न हमसे शक्तिशाली,न ही बुद्धिमान थे। मगर हमारे आपसी झगड़ों ने हमें मुट्‌ठी भर अंग्रेजों का गुलाम बना कर रख दिया था।

अपने शासन काल में अंग्रेजों ने केवल हमारे देश का शोषण दोहन ही किया हो ऐसी बात नहीं है। उन्होंने अपने शासन की सुविधा के लिये ही नही इस देश के लिए यहॉ के लोगों के लिए यहां सड़कों का जाल बिछाया, देश में एक छोर से दूसरे छोर तक रेल की पटरियों को पहुँचाया, डाक-पत्थर, टेलीफोन की सुविधाओं को विकसित किया, शहरों में जलापूर्ति के लिए वाटर टैंक बनवाये, अस्पतालों, बिजली घरों का निर्माण कराया, दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में खूबसूरत हिल स्टेशनों को बसाया। हर बड़े शहर के मध्य बड़े पार्क बनवाये,विशाल घन्टाघर बनवाये ताकि आम आदमी को समय का पता चल सके। इन घन्टा घरों में हर घन्टे बजने वाली घंटियां मीलों दूर तक व्यक्ति को बता देती थीं कि क्या समय हुआ है। इस तरह उन्होंने एक ऐसे आधुनिक भारत की नींव भी रखी थी जिससे सभ्यता, संस्कृति, पर्यावरण की शुद्धता तो बनी रहे पर उनका दोहन, शोषण, विनाश न हो!

बचपन में माँ ने बताया था कि पिताजी सन्‌ 1945 में मसूरी आये थे। अंग्रेजों का जमाना था। शादी के तुरन्त बाद पिताजी की तब नई-नई पोस्टिंग हुई थी राशनिंग अफसर के पद पर, मसूरी में। तब बहुत कम भारतीय टाई सूट पहनते थे, वे भी वही जो अधिकतर सरकारी नौकरी में होते थे। पिताजी का साहबों वाला हैट बहुत समय तक हमारे घर की शोभा बढ़ाता रहा था। माँ बताती है कि तब उस समय जो असली मसूरी थी, मलिंगार कहलाती थी। उसके भी ऊपर मसूरी की सबसे ऊंची चोटी लाल टिब्बा में रहते थे मां और पिताजी। बरसात के दिनों में सर्दी के दिनों में मसूरी लगभग खाली हो जाती थी। तब इतनी बर्फ पड़ती थी कि घर के दरवाजे ढक जाते थे, तब हर घर में बेलचा-फावड़ा अवश्य रहता था जिससे लोग दरवाजों की, खिड़कियों की, आंगन की और रास्ते की बर्फ हटाया करते थे। सन्‌ 1965 में अपने बचपन के दिनों से आज तक भी, मैं मसूरी आठ-दस बार प्रतिवर्ष आया करता हूं। इस कारण मैंने मसूरी को हर वर्ष बदलते देखा। सन्‌ 1965 में खुला हुआ पिक्चर पैलेस था जहां से दूर-दूर की हिमाच्छादित चोटियां दिखाई पड़ती थीं। माल रोड पर ही क्या हर जगह बिल्कुल एक खूबसूरत गाँव सा नजर आता था। जून की पहली बारिश के साथ ही पर्यटकों की दौड़ मसूरी छोड़ने के लिये हो जाती थी और अप्रैल के अंत तक मसूरी में बस कुछ ही स्थानीय लोग घूमते नजर आते थे। मगर आज की मसूरी अब वह मसूरी नहीं रही। यह दुःख मुझे सालता है। वर्तमान की मसूरी, यदि यह विकास या उन्नति का प्रतीक है, यदि यह सभ्यता-संस्कृति के विकास का सूचकांक है तो कम से कम मैं ऐसा विकास, ऐसी उन्नति को कभी स्वीकार नहीं कर सकता।

जैसा कि हर शहर का अपना एक लम्बा इतिहास होता है, एकाएक या एक दिन में कोई शहर अचानक नहीं बसता। इसी इतिहास से गुजरते हुये विश्व के सारे शहर वर्तमान तक पँहुचे हैं। इस लम्बे समय के बीच शहर, नगर के उत्थान-पतन का क्रम भी कई बार आता जाता रहता है। अंग्रेजों द्वारा बनाये गये हिल स्टेशनों दार्जिलिंग, नैनीताल, डलहौजी, शिमला जैसा एक मसूरी भी है, जिसकी सुन्दरता की वजह से इसे किसी समय पर्वतों की रानी के नाम से पुकारा जाता था। पर कटु सत्य है कि आज की मसूरी वह खूबसूरत मसूरी नहीं है जैसे अंग्रेजों ने बसाया था। किसी समय दूर-दूर बिखरे मकानों वाली, छितरी-बिखरी देवदार, बांज, बुरांस के वृक्षों से आच्छादित खूबसूरत मसूरी थी, जो आज किसी बिगड़े शहर, बदसूरत शहर का घना मुहल्ला सी नजर आती है।

किसी समय देहरादून से तीस किलोमीटर दूर उत्तर में पूर्व से पश्चिम तक फैली पर्वत श्रृंखलाओं  पर प्राकृतिक रूप से मंसूर के पौधे और झाड़ियां स्वतःउगा करती थीं, सम्भवतः इसी कारण इसका नाम मंसूरी पड़ा। अंग्रेज एकांतप्रिय और शांत शुद्ध वातावरण वाले ठण्डे पर्वतीय स्थानों को अधिक पंसद करते थे। भले ही वे दुर्गम स्थान हों। नये-नये स्थानों को खोजना भी उनकी आदत में शामिल रहता था। अतः इन पर्वत श्रृंखलाओं ने उन्हें भी आकर्षित किया। इस विषय पर बुद्धिजीवियों में मतभेद अवश्य रहा कि सर्वप्रथम मसूरी को किसने बसाया था। कुछ लोगों का मत है कि ब्रिटिश सेना का एक कैप्टेन, (जिसका नाम यंग था) शिकार खेलने इन पहाड़ियों की ओर आया और उसने ही यहाँ सबसे पहले अपना आखेट गृह और भवन बनाया, जिसे आज मलिंगार के नाम से जाना जाता है। उन दिनों मसूरी की पहाड़ियां घने जंगलों से भरपूर होने के कारण वन्य जीवों की शरणस्थली  कही जाती थीं। कैप्टेन यंग ने अपने मित्रों के ठहरने तथा विश्राम के लिये यह भवन बनवाया था। मगर साथ ही कुछ लोगों का मत है कि 1823 में देहरादून के तत्कालीन जिलाधिकारी जे. एफ.शौर जो स्वयं अच्छे शिकारी थे और शिकार खेलने के शौकीन थे,ने गनहिल के पास अपना एक विश्राम गृह बनवाया था। 1826 में शोर ने एक विश्राम गृह आज के मुख्य बाजार के ऊपर बनाया, जो आज जफर हाल के नाम से जाना जाता है। 1826 में जे.एफ.शौर ने अंग्रेजों के विश्राम के लिए मसूरी टिब्बा नामक पहाड़ी के ऊपर कुछ भवन बनवाये थे। मगर आज मसूरी को बसाने और वहाँ सबसे पहले भवन बनवाने का श्रेय कैप्टेन यंग को ही दिया जाता है।

दूर-दूर तक फैली मसूरी पर्वत श्रृखंलाओं के अधिकांश क्षेत्र के स्वामी 1816 से पहले टिहरी नरेश थे तथा शेष भाग देहरादून के गुरु दरबार साहब के महन्त की जागीर के अन्तर्गत आते थे। 1816 से पहले ही अंग्रेजों ने इनसे, काफी कुछ भाग खरीद लिया था। क्योंकि गोरखाओं को खदेड़ने में अंग्रेजों ने राजा सुदर्शन शाह को जो सहयोग दिया था उसके बदले में राजा ने अंग्रेजों को देहरादून के साथ मसूरी का यह क्षेत्र भी दे दिया था। उस समय ब्रिटिश साम्राज्य विश्व में सबसे शक्तिशाली था। अपने साम्राज्य को निरन्तर विस्तार देने में इंग्लैण्ड को अनेक स्थानों पर युद्ध करना पड़ता था। तब अपने थके-मांदे, घायल सैनिकों के आराम के लिये अंग्रेजों ने लंढौर की पहाड़ी पर कुछ भवन और फिर अस्पताल बनावाये, बाद में अनेक कोठियां भवन, सड़क, बाजार बनवाए। लंढौर के पास में ही लाल टिब्बा नामक पर्वत श्रृंखला है, जिसकी समुद्र तल से ऊँचाई 7460 फुट है। यहां पर स्थापित दूरबीन से हिमालय की एक छोर से दूसरे छोर तक फैली अनेक प्रमुख चोटियों नन्दादेवी, चौखम्बा, श्रीकंठ, बंदरपुंछ, केदारकांठा, त्रिशूल, सुरकंडा देवी के भव्य दर्शन होते हैं।

श्री जयप्रकाश उत्तराखण्डी (प्रसिद्ध लेखक और समाजसेवी) ने अपने शोधपूर्ण ग्रन्थ में बताया है कि मसूरी के बसने से पूर्व अनेक जमींदार, टिहरी नरेश और गुरु दरबार साहब के महन्त की अनेक पटि्‌टयों, गाँवों की देखभाल किया करते थे। उस समय इस क्षेत्र के प्रमुख पटि्‌टयों, गाँवों को, क्यार कली, भट्‌टा गाँव, तुनेठा, कोईरी, धण्डियाला, रिखोली, कसूरी, चामासारी, मसरास पट्‌टी आदि के नाम से जाना जाता था। सन्‌ 1925 तक कुछ अन्य क्षेत्र निम्न नामों से जाने जाते थे कुमायत्री, डंकोल, सितारों की टोंगरी, संतरावाड़ी, खोलरी, केलमाली, कालरी, बिजोगी, टोंगरी, जूरापानी, हाथीपांव, जब्बर खेत, बाटाघाट, सुवाखोली, लंढोर टिब्बा, भदराज, दुधली, परी टिब्बा, कोलरी, सुराणापाणी, बिनोग आदि क्षेत्र, जो भदराज मंदिर से सुआखोली तक फैले थे। उत्तराखण्डी जी का कहना है कि 1822 में मसूरी की आबादी लगभग 450 थी, 1951 में जो 7133, 1961 में 9850 हो गयी थी, तब से लेकर इस खूबसूरत नगरी के दोहन और शोषण करने के लिये मैदानी क्षेत्र से, जो दौड़ शुरू हुई उससे इसकी आबादी 50000 से ऊपर तक जा पहुंची। आज मसूरी चार्लिविला से बाटाघाट के पास तक भवनों और मकानों से आच्छादित कंक्रीट का जंगल हो गया है।

बहुत ही कम लोगों को आज ज्ञात है कि किसी समय टिहरी राज्य को एक अलग देश के रूप में जाना जाता था। देहरादून के तत्कालीन विशेष अधिकारी ने अपने एक सरकारी पत्र में टिहरी नरेश को किंग आफ गढ़वाल कन्ट्री कह कर सम्बोधित किया था। 19 वीं शताब्दी तक इस समूचे क्षेत्र में घने जंगल थे। देहरादून मसूरी तक 1812 तक कोई मार्ग न था। मगर कहते हैं कि सेलाकुई, कालसी, प्रेमनगर से प्राचीनकाल से ही एक पगडण्डी भदराज मंदिर तक जाती थी। यही पगडण्डी लंढोर पहाड़ी से गुजर कर कहीं आगे निकल जाती थी।

महाभारत काल और पाण्डवों के गुप्तवास का उत्तराखण्ड से गहरा संबंध था और माना जाता है कि भदराज मंदिर को महाभारत काल में कृष्ण के भाई बलराम द्वारा बनवाया गया था और विमोग टिब्बा के पास ही पाण्डवों ने अपना निवास स्थान बनाया था गुप्तवास के दौरान। भदराज मंदिर पाण्डव कालीन होने के कारण लोगों की अपार श्रद्धा, व आस्था का केन्द्र था, इस कारण श्रद्धालुओं का इस ओर आवागमन निःसंदेह बना रहता होगा। कहते हैं कि जब गोरखाओं ने आक्रमण किया था तब वे इसी पगडण्डी के मार्ग से जौनपुर टिहरी की ओर बढे़ थे। 1825 में इस मार्ग की भदराज मंदिर से लंढोर तक मरम्मत का कार्य भी हुआ था। 1830-31 में राजपुर से मसूरी तथा क्लाउड एण्ड से लंढोर तक के मार्ग को चौड़ा करने का कार्य किया गया था। मसूरी नगर किसने बसाया इस पर भले ही बहस हो पर भदराज मंदिर के पास ही एक चट्‌टान पर एक अंग्रेज महिला का नाम लेडी हुड 1814 खुदा हुआ है। सम्भवतः वह इस ओर भ्रमण करने आयी थी। और शायद अंग्रेज भी इसी मार्ग से घूमने आये थे।

अंग्रेजों की क्रूरता, शोषण के प्रति हमारी भावनाएं भले ही कैसी भी रही हों मगर गरीबों के हित के लिये उनके द्वारा किये गये सुधारों की हम अनदेखी नहीं कर सकते। उस समय बराबेगार प्रथा का खूब बोलबाला था अर्थात राजा महाराजा, उनके सिपहसालार, राज्य के दबंग लोग जब चाहे मजदूरों, गरीबों,किसानों को भयभीत कर काम के लिये ले जाते और कुछ भी मजदूरी नहीं देते थे। देहरादून के तत्कालीन जिलाधिकारी जे.एफ.शोर ने 1824 में सबसे पहले, बेगार प्रथा पर रोक लगा कर मजदूरी तय करके शोषण को रोका था।

 सन्‌ 1827-28 में अंग्रेजों का मसूरी में आगमन काफी बढ़ गया था और लंढोर क्षेत्र को उन्होंने आबाद करना शुरु कर दिया था। रहने के लिये भवन, विश्रामगृह, घायल बीमार सैनिकों के लिए अस्पताल और एक खूबसूरत सिस्टर बाजार, प्लटन बाजार बनाया। पहले इस पहाड़ी को लुढोर के नाम से जाना जाता था। प्रसिद्ध समाजसेवी लेखक जय प्रकाश उत्तराखण्डी अपने शोध ग्रन्थ में बताते हैं कि अंग्रेजों का उच्चारण कुछ अलग तरह का था और वे इसे लुंढोर नाम से पुकारते थे। कुछ का कहना है कि यहाँ रहते वे इसे अपनी भूमि मान कर “लैंड आवर” कहने लगे थे, यही शब्द लंढोर (लैन्ड आवर) से बना। कुछ का मानना है कि अंग्रेजों की एक फौजी टुकड़ी लुढोंर के नाम से जो यहाँ रहती थी से यह नाम पड़ा। 1826 में लंढोर में छावनी परिषद बनी, कुलड़ी में प्रसिद्ध रेलवे आउट एजेन्सी तथा डाकखाने का छोटा भवन बना। आज बाटाघाट से क्लाउड एण्ड तक मसूरी एक पंक्ति में बसी नजर आती है। परन्तु किसी समय लंढोर, शेष मसूरी से एक अलग उपनगर जाना जाता था। एक समय था जब मसूरी में सुनसान पहाड़ी थी, तो दूसरी ओर लंढोर, चमक दमक और बाजार से भरपूर छोटा सा नगर था। मगर 1840 के बाद कुलड़ी में बस्तियां और बाजार बनना शुरू हुआ और बिल्कुल एक नई मसूरी उभरने लगी थी। और हमेशा चहल पहल व रौनक से भरपूर लंढोर में उदासी पसरने लगी थी।

 लंढोर से हटकर मसूरी को विकसित करने में और उसे खूबसूरती की बुलंदियों तक पहुंचाने में अनेक अंग्रेजों और यूरापियनों ने महत्वपूर्ण सहयोग दिया था। पहले जब अंग्रेज भदराज वाले पगडण्डी मार्ग से यहाँ घूमने आये तो उन्हें दुधली और भदराज मंदिर के पास की पहाड़ी बहुत पसंद आयी और उन्होंने वहीं पर मंसूरी को बसाना चाहा। परन्तु वहाँ पानी का अत्यन्त अभाव था। पास में कोई बड़ा जलस्रोत न होने के कारण मसूरी को वहाँ बसाने का उनका स्वप्न सच न हो सका। भदराज मंदिर से पाँच किलोमीटर दूर मंसूरी की ओर तथा हाथी पाँव से जब दो किलोमीटर दूर घने जंगलों से होकर उत्तर पूर्व की ओर चलते हैं तब एक पहाड़ी की खूबसूरत चोटी पर जार्ज एवेरेस्ट भवन खण्डहर के रूप में दिखाई पड़ता है। सन्‌ 1832 में यह पहाड़ी, राजा सुदर्शन शाह ने जार्ज एवरेस्ट को प्रदान की थी। जार्ज ऐवरेस्ट ने यहां अपना हैड क्वार्टर बनाया, वे भारत के प्रथम सर्वेयर जनरल थे। उन्होंने ही सर्वप्रथम विश्व के सबसे ऊँचे पर्वत एवरेस्ट को खोजा था। जार्ज एवरेस्ट भवन के उत्तर की ओर, पश्चिम से पूर्व की ओर दूर-दूर तक फैली खूबसूरत घने जंगलों से आच्छादित पर्वत श्रृंखलाएं दिखाई पड़ती हैं तो दक्षिण की ओर हजारों फुट नीचे एक छोर से दूसरे छोर तक फैली विस्तृत दून घाटी और दूर छोटी शिवालिक पर्वत श्रृंखलाएं दिखाई पड़ती हैं। शाम को दूर क्षितिज में डूबते सूरज का दृश्य, देखने योग्य दृश्य होता है। हाथी पाँव के पास ही विनोग टिब्बा है इसकी घाटी को दुधली घाटी कहा जाता था। गर्मियों के बाद बरसात के मौसम में खूबसूरत बादल के टूकड़े एक छोर से दूसरे छोर तक तैरते मनमोहक दृश्य प्रस्तुत करते थे। अंग्रेजों ने तब इस बादलों की तैरती घाटी को क्लाउड एण्ड के नाम से पुकारा था।

अभी कुछ वर्ष पहले तक जार्ज एवरेस्ट की पहाड़ी पर व्यापक पत्थरों के खदान का कार्य चल रहा था। बाद में अनेक पर्यावरणविदों और संगठनों के विरोध के फलस्वरूप सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इन खदानों पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। अब शनैःशनै यहाँ की हरियाली वापस लौट रही है। यहाँ से कुछ ही दूर है, मसूरी के बहुत पुराने स्थानों में से एक चार्लिबिल नामक स्थान। किसी समय यह स्थान जौनपुर की छैजूला पट्‌टी के अन्तर्गत महन्त जी की जागीर का हिस्सा था। यहाँ आकर बसने पर अंग्रेज अपने को बेहद खुश और प्रसन्न महसूस करते थे इसी कारण उन्होंने इस स्थान को ‘प्रसन्नता की घाटी’ अर्थात ‘हैप्पी वैली’ के नाम से पुकारा था। यहाँ एथन्स नामक अंग्रेज ने ‘द काटेज’ तथा जे.आर.ट्रोप ने ‘इगलनेस्ट’ नामक भवन बनवाये थे। आज जिसे चालिर्बिल होटल के नाम से पुकारा जाता है, वह ‘द काटेज’ नामक भवन ही है। जिसे विल्किसन ने खरीदा था फिर श्रीमती डिक ने इसे खरीद कर चार्लिबिल होटल नाम दिया। तभी से इस स्थान कोचार्लिबिल या फिर हैप्पी वैली के नाम से जाना जाता है। इसके पास खूबसूरत कम्पनी बाग है जिसे प्रसिद्ध भू-वैज्ञानिक एच.फाकनर ने विकसित किया था। सन्‌ 1833 में जान मेकिनन ने यहाँ कैण्डीलाज नामक भवन बनवाया था।

चर्लिबिल में ही था एक खूबसूरत काटेज, जहाँ महापण्डित राहुल सांकृत्यायन ने सन्‌ 1950 से 1958 तक निवास किया था। इस भवन में कुछ वर्ष पहले तक एक डिस्पैंसरी चल रही थी। यह ऐतिहासिक भवन अब धवस्त हो गया। जब मैं इस भवन को खोजने निकला था तो आसपास के किसी व्यक्ति को ज्ञात भी न था कि इस भवन में कभी महापण्डित राहुल सांकृत्यायन ने निवास किया था। लगभग घण्टे भर की मेहनत के बाद आंखों के सामने थोड़ी दूर पर स्थित इस भवन को हम जान पाये थे। प्रसिद्ध साहित्यकार स्व. हरिदत्त भट्‌ट शैलेश ने बहुत पहले भारत सरकार को पत्र भेज कर यह अनुरोध किया था कि इसे राहुल सांकृत्यायन पुस्तकालय के रूप में विकसित किया जाए, पर अभी तक ऐसा हुआ नहीं, और यह भवन अब धवस्त हो गया है। पास में ही है लाल बहादुर शास्त्री प्रशासनिक अकादमी, जहाँ देश के भावी कर्णधारों को तराशा और संवारा जाता है। चार्लिबिल से एक मार्ग कम्पनी बाग के ऊपर से होकर पूरे पहाड़ से घूम कर विन्सैन्ट हिल पहाड़ी की ओर जाता है। इस पहाड़ी के प्रारम्भ में गुरुनानक एकाडेमी से होते हुए पहुँचते हैं पहाड़ी के कोने में, जिसे ‘शैल शिखर’ कहा जाता है। यहीं निवास स्थान है स्व. डा. हरिदत्त भट्‌ट ‘शैलेश’ जी का। पास में ही आई.टी.बी.पी. का कार्यालय (भवन) है। पहाड़ी के नीचे 1975 तक चलता था ब्रिमलेटावर नामक स्कूल। इसके निकट आवास में अक्सर गरमियों में मेरा आना जाना रहता था। किसी समय यह पूरी पहाड़ी जंगली वृक्षों से आबाद सुनसान थी पर अब कंक्रीट का जंगल फैलता जा रहा है। 1833 में ब्रिगेडियर विन्सेन्ट ने इस पहाड़ी को खरीदा था और इसकी चोटी पर यहां ‘द पीक’ नामक भवन बनवाया था जो बाद में अल्वर्ट हाल के नाम से विख्यात हुआ था।

विन्सेन्ट हिल की पर्वत श्रृंखला को पार कर हम पँहुचते हैं लाइब्रेरी चौक जो गांधी चौक के नाम से भी जाना जाता है। यहां पर महाराजा कपूरथला का भवन तथा सवाय होटल जैसे प्रसिद्ध भवन हैं। चौक में ही अंग्रेज कालीन लाइब्रेरी है जहाँ कभी बोर्ड लटका रहता था ‘इंण्यिन्स एण्ड डॉग्स आर नाट एलाउड’। किसी समय लाइब्रेरी क्षेत्र, घने जंगल और जानवरों के चरागाह के रूप में जाना जाता था। यहाँ दूर-दूर बसे गाँव वालों ने गाय, भैंस, पशुओं के लिये छानियां बना रखी थीं, या फिर छोटे छोटे खेत भर थे यहॉ। बाद में यहॉ बस्ती बसती चली गयी। फिर आज के हवा घर के कुछ पीछे प्रसिद्व सवाय होटल और आगे झूलाघर के पास हैक्मेन होटल बने जो अंग्रेजों की चहल पहल से रौनक से भरपूर रहे और जिन्होंने मसूरी को नई पहचान दी। देर रात तक डॉस और पार्टियों का यहॉ दौर चलता था। फिर यहॉ ग्रांट लाज,मसूरी काटेज, सेन्ट हेलन, फौनिक्स लाज जैसे खूबसूरत काटेज बने। 1835 तक लारेल और बिलो बैंक यहॉ कुलड़ी में खुले।1836 में क्राइस्ट गिरजाघर का निर्माण तथा दुकानों का निर्माण कुलड़ी में शुरू हुआ। 1836 में ही मसूरी लाइब्रेरी, 1947 में मसूरी स्कूल बनने के साथ ही इस क्षेत्र का तीव्र विकास हुआ। 1946 में महात्मा गॉधी मसूरी आये तब से लाइब्रेरी चौक,गॉधी चौक के नाम से प्रसिद्ध है।

आज के झूलाघर के सामने जो पहाड़ी है उसे अंग्रेजों के जमाने सें गनहिल, अर्थात तोप टिब्बा के नाम से जाना जाता है। कहते हैं कि उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में इस पहाड़ी के ऊपर अंग्रेजों ने एक विशाल तोप स्थापित की थी। इस खड़ी पहाड़ी पर तब पैदल चलकर पहुंचा जाता था। सत्तर के दशक में झूलाघर से गनहिल तक रोपवे बनने से अब यहॉ पहुंचना बहुत आसान हो गया है। चोटी पर विशाल मैदान बना हुआ है जिसके नीचे विशाल वाटर टैंक अंग्रेजों ने बनवाया था जहाँ से मसूरी के निवासियों को जल की आपूर्ति होती थी। यहाँ से एक छोर से दूसरे छोर तक फैली हिमालय की अनेक हिम से आच्छादित मनोरम चोटियों के दर्शन होते हैं विशेषकर साफ मौसम में। नीचे दक्षिण की ओर मसूरी का खूबसूरत दृश्य और दूर विस्तृत फैली दून घाटी का दृश्य मन को मोह लेता है। मसूरी से रात में दीपमालाओं से जगमगाती दून घाटी का विहंगम दृश्य उस समय तो और भी मंत्रमुग्ध कर देता है जब रात के गहन काले अंधकार में दून घाटी रोशनी से झिलमिला रही हो। पीछे की तरफ गन हिल की पहाड़ी के लिए रास्ता जाता है। कुछ दूर आगे पहाड़ी के बीच में चट्‌टानों से निर्मित एक ऊंट की खूबसूरत आकृति है जिस कारण पहाड़ी के उस क्षेत्र और मार्ग को कैमल बैक के नाम से जाना जाता है। 1857 से 1919 तक गन हिल पर स्थापित विशाल तोप दिन के ठीक बाहर बजे ग रज उठती थी। जिसकी आवाज घाटी और पहाड़ियों पर मीलों दूर तक सुनाई पड़ती थी, जिससे आम आदमी को समय का पता चल जाता था। बाद में कुछ ऐसे कारण हुए कि जनाक्रोश के कारण इसे हटा दिया गया था। तोप के कारण ही यह पहाड़ी ‘गन हिल’ के नाम से प्रसिद्ध हुई और पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र बनी थी और आज भी जानी जाती है। मसूरी में एक अन्य पुराना स्थान पानी के स्रोत के कारण जूरापानी के नाम से जाना जाता था। जो आज झड़ी पानी के नाम से जाना जाता है। . मुनेरो, मेजर एंजलो, मेजर बार्कले आदि अंग्रेजों ने इस खूबसूरत पानी के स्रोत के पास बार्लोगंज को धीरे-धीरे विकसित किया उस समय मसूरी-राजपुर पगडण्डी मार्ग यहीं से होकर गुजरता था और राजपुर से सामान कुलियों-मजदूरों या खच्चरों द्वारा बर्लोगंज से मसूरी पहुँचाया जाता था। 1860 के आस-पास यहाँ सेन्ट जार्ज कालेज तथा सेन्ट फीडिल्स जैसे प्रसिद्ध स्कूल अंग्रेजों ने खोले, बाद में ओक ग्रोव स्कूल खुला।

सन्‌ 1843 के लगभग जान मेकिनन आयरिश नामक अंग्रेज ने पहले देहरादून से कोल्हूखेत होकर पैदल मार्ग, बाद में इसे खच्चर बैलगाड़ियों लायक चौड़ा मार्ग बनवाया। किसी समय कोल्हूखेत तेल उत्पादन का एक बड़ा केन्द्र था। यहाँ के अनेक खेतों में कोल्हू में बैलजुते रहते थे, इसी कारण इस स्थान का नाम कोल्हू खेत पड़ा था। यहाँ पर फिर यात्री विश्राम के लिये, बैलगाड़ियां, खच्चर विश्राम तथा दाना-पानी के लिए रुकने लगे थे। बाद में यहाँ चुंगी लेने के लिये टोल चौकी की स्थापना की गई थी।  1920 में पहली कार इस सड़क से होकर मसूरी पहुँची थी। अब न यहाँ कोल्हू है, न कोल्हू के खेत, बस नाम भर रह गया। 1995 तक यहाँ बसें, टैक्सियां रुकती थीं, यात्रियों से टैक्स लिया जाता था पर कुछ वर्षों पहले इसे बंद कर दिया गया था तब से यहाँ की रौनक खत्म हो गई थी मगर अब इसे पुन शुरु कर दिया गया है।

 जान मेकिनन वह आयरिश व्यक्ति था जिसने 1842 में सबसे पहले मसूरी में छापाखाना लगाया था तथा ‘द हिल्स’ नामक समाचार पत्र निकाला था। हम अंग्रेजों की हर दृष्टि से आलोचना करना नहीं भूलते हैं पर मसूरी में इतिहास की एक दो घटनाएं अंग्रेजों की महानता को दर्शाती हैं। जैसे, मजदूरों की बेगार प्रथा समाप्त कर उनकी प्रतिदिन की मजदूरी तय करते हुए कानून बनाया था। दूसरा जब अंग्रेज और यूरोपियन मसूरी क्षेत्र की भूमि पर अनाधिकृत कब्जे कर रहे थे तब देहरादून के अधिशासी अधिकारी एफ.जे. शोर ने इसके विरुद्ध कार्यवाही और लिखा-पढ़ी की थी, फलस्वरूप ऐसे कब्जों के विरुद्ध कम्पनी सरकार ने 1830 में भूमि अधिकार संरक्षण कानून पास किया था। आज देश में भीड़ के रूप में, बदमाशों, गुंडों राजनैतिक संरक्षण प्राप्त लोगों द्वारा सरकारी जमीनों पर जबरन कब्जे किए जा रहे हैं और सत्ता के दलाल वोटों के लालच में चुप बैठकर तमाशा देखते रहते हैं।

किसी समय मसूरी के ठीक दो किलोमीटर नीचे क्रिंक्रेग नामक स्थान पर काफी चहल-पहल रहती थी, यहाँ छोटा सा बाजार हुआ करता था। राजा महाराजाओं, अंग्रेजों के वाहन, घोड़े गाड़ियां, पालकी आदि यहीं पर अपने मालिकों की प्रतीक्षा करते थे। यहाँ से खच्चरों, मजदूरों द्वारा सामान आगे पहुँचाया जाता था। लंढोर क्षेत्र में अंग्रेजों ने 1822 में बूचर खाना, खच्चर खाना बनवाया। बूचर खाने से अंग्रेजों को मांस आदि की पूर्ति होती थी तो खच्चर खाने में मजदूरों और खच्चरों, घोड़ों के विश्राम के लिये टिन शेड बनवाये गये थे। यह बाद में मुर्दाघाट के नाम से जाना जाने लगा था। खच्चर खाना आज नाम भर रह गया है। 1820 से 1840 के बीच जब मसूरी में धीरे-धीरे आबादी बढ़ने लगी थी, तब उस समय वहाँ के लोगों ने वहाँ पानी, रोशनी, सड़क, स्वास्थ्य, सफाई की व्यवस्था को सुचारू बनाए रखने के लिए नागरिकों की एक समिति बनाई। ये सभी लोग आपस में पैसा एकत्रित कर 1840 तक इन व्यवस्थाओं की देखरेख करते रहे। ब्रिटिश सरकार ने 1842 में मसूरी नगरपालिका का प्रस्ताव पास किया था। यह संस्था तब नगरपालिका के अधीन कार्य करने लगी थी। इसके अन्तर्गत तब भदराज मंदिर से राजपुर तक का क्षेत्र था। उस समय लंढौर छावनी परिषद के अन्तर्गत और मसूरी इस संस्था नगरपालिका के अन्तर्गत आता था। उस समय मसूरी और लंढौर का अलग-अलग अपना पृथक अस्तित्व था। दोनों का मुख्यालय देहरादून हुआ करता था। 1840 में पहली पुलिस चौकी मसूरी में बनी तथा तभी उप जिलाधिकारी का कार्यालय भी मसूरी में खुला था। अंग्रेजों का सपना केवल देश पर राज कर उसका शोषण करना नहीं था। उन्होंने देश के हर हिल स्टेशन तक रेलवे लाइन बिछाने की योजनाएं बनाईं। जिनमें दार्जिलिंग, शिमला, सिलिगुड़ी में वे सफल भी हुये। मगर नैनीताल, मसूरी तक रेलवे लाईन बिछाने का सपना उनका कुछ कारणों की वजह से पूरा नहीं हो पाया था। जान मेकिनन ने 1865 में देहरादून से राजपुर-मसूरी तक रेल ट्रैक बिछाने का प्रस्ताव रखा था, जो स्वीकार भी हुआ। कार्य का सर्वेक्षण भी हुआ, कार्य भी प्रारम्भ हुआ, मगर इस विद्युत रेलवे को चलाने के लिये जितनी हार्सपावर विद्युत की आवश्यकता थी, जब वह गिलोगी विद्युत गृह से मिल पाने की सम्भावना नहीं लगी, तब यह योजना ठप्प हो गयी  थी।

19वीं सदी तक मसूरी में घना जंगल था। जगह-जगह पानी के झरने बहते दिखाई पड़ते थे। मगर बढ़ती आबादी के सैलाब ने इनका नामोनिशान मिटा दिया। 1855-56 के बीच छोटे-छोटे वाटर टैंक बनाये गये थे। कुलियों, खच्चरों, भिस्तियों द्वारा राजा महाराजाओं के घरों, होटलों, स्कूलों, कार्यालयों में यहाँ से पानी पहुँचाया जाता था तथा इन टैंकों द्वारा सार्वजनिक स्थलों तक पानी की आपूर्ति की जाती थी।1906 में गनहिल और 1908 में विन्सेण्ट हिल पर रिजर्ववाटर टैंक बने। मसूरी की मुख्य सड़कों पर लैम्प जलाकर रात में प्रकाश की व्यवस्था की जाती थी। सन्‌ 1907 में देश का दूसरा बिजली घर, गिलोगी विद्युत गृह 6600 वोल्ट का मसूरी में बना। 1840 के आसपास घण्टाघर के पास तथा मसूरी में पोस्ट आफिस खुले डाक व्यवस्था प्रारम्भ हुई। मनोरंजन के लिये होटल, डांसघर, थियेटर, क्लब, बार बनने लगे थे। कहते हैं 10 जनवरी 1945 को मसूरी में अब तक की सबसे अधिक बर्फ पड़ी थी अर्थात 7 फुट 8 इंच बर्फ पड़ी थी।

 उत्तराखंड राज्य के आन्दोलन में मसूरी की भूमिका को कभी भुलाया नहीं जा सकता। आन्दोलन के दौरान प्रतिदिन उग्र प्रदर्शन होते थे। खटिमा गोलिकाण्ड के विरोध में हुए प्रदर्शन में झूलाघर के पास हुई पुलिस फायरिंग में अनेक आन्दोलनकारी शहीद हुए थे जिनकी शहादत से एक नए राज्य का उदय हुआ। यह स्थान आज शहीद स्थल के नाम से जाना जाता है। मसूरी विश्व के उन गौरवशाली स्थानों में से एक है जहाँ विश्व की अनेक महान हस्तियों ने कदम रखे। 1838 में ब्रिट्रेन के राजपरिवार के सदस्य पर्ल आफ आकलैण्ड, 1842 में अफगानिस्तान के पराजित शासक दोस्त मोहम्मद, 1853 में रणजीत सिंह के पुत्र दिलीप सिंह जैसी हस्तियाँ यहाँ रही थीं। 1904 में झड़ीपानी में स्वतंत्रता सेनानी रास बिहारी बोस ने शरण ली थी। महापण्डित राहुल सांकृत्यायन ने अपने जीवन के आठ वर्ष यहाँ व्यतीत किये थे। पंजाब के राजा रणवीर सिंह, महाराजा होल्कर, अफगानिस्तान के बादशाह याकूब खान, महाराजा कपूरथला, रामपुर के नवाब, महाराजा बड़ौदा, टिकारी के राजाओं के साथ अनेक महत्वपूर्ण हस्तियों ने मसूरी में अपने आवास बनाये। आज भी रस्किन बांड, टाम आल्टर (जो यहां रहा करते थे), हिमानी शिवपुरी,स्व. हरिदत्त भट्‌ट ‘शैलेश’, सचिन तेंदुलकर जैसी हस्तियां मसूरी से जुड़ी रहीं।

 आन्दोलनों के इतिहास में मसूरी के सफाई कर्मचारियों का आन्दोलन अपना अलग स्थान रखता है। 1908 में हुआ यह आन्दोलन झाड़ू आन्दोलन के नाम से इतिहास के पृष्ठों पर अंकित है। मसूरी के इतिहास में, यहाँ से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्रों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इनमें में फिसलाईट,मसूरी एक्सचेंज,मसूरी सीजन,हिमालय क्रानिकल,द ईगल,वर्तमान शताब्दी,द हरेल्ड वीकली, मसूरी एडवाइजर आदि प्रमुख थे,जो समय-समय पर निकलते रहे और बंद होते रहे।

मसूरी को घने बीहड़ जंगल से सुन्दरता, सभ्यता, संस्कृति, शिक्षा की समृद्धि सम्पन्नता के मार्ग से, जिन लोगों ने इसे विश्व के सुन्दरतम हिल स्टेशन की बुलन्दी तक पहुँचाया उनमें उन महान अंग्रेजों और यूरोपियनों के नाम को शायद कभी भुलाया नहीं जा सकेगा – कर्नल एच.फिशर, कैप्टेन यंग, मेजर ई. विटे, सर्जन एम.बी. लैम्ब, जार्ज लांगन, जार्ज एवरेस्ट, जानमेकिनन, फ्रेडिरिक विल्सन, जर्मन दार्शनिक कार्लवर्न होल्ड, एफ.एच. कैनेडी, सी.एफ. कोलिन्स, जूलियर हेनरी जेम्स, चार्ल्स अगस्टस, मार्गेट एलिजाबेथ, कर्नल जे.एफ. वेर, एच. हैम्मैन, के.ए. हेजेम्स, स्टेदम जैसे अनेक लोग थे जिन्होंने मसूरी से बेहद प्रेम किया और अन्तिम सांसों तक मसूरी में निवास किया। काश मसूरी लौट सकती अपने पुराने ही सही मगर सुन्दर खूबसूरत, शुद्ध पर्यावरण, सभ्यता, संस्कृति से समृद्ध भरपूर दिनों की ओर। इसमें संदेह नहीं कि बढ़ती आबादी की हवस पूर्ति ने मसूरी की सुन्दरता, सभ्यता, संस्कृति और खूबसूरत पर्यावरण को समाप्त सा कर दिया है।     

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