मनुष्य जीवन में अहमता ही रावणत्व है

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1891
आचार्य शिवप्रसाद ममगाईं ,ज्योतिष पीठ व्यास पद से अलंकृत

रावण युद्धोन्माद में संसार में दौड़ लगा रहा था, अकारण धावा बोल रहा था। पर उसे अपने जोड़ का/उसके समान योद्धा नहीं मिले, क्यों? ये रावण के कथन से भी स्पष्ट है कि वह पूछता है कि बताओ मेरे समान योद्धा कौन है-कहुं जग मोहि समान को जोधा?

तो अंगद ने बड़ा अच्छा सूत्र दिया है जो हमारे लिए भी बहुत उपयोगी है। प्रतिभट खोजत कतहुं न पावा-अर्थात् अपने बराबरी के योद्धा रावण को नहीं मिला। इसका केवल ये अर्थ नहीं कि वो सर्वश्रेष्ठ हो बल्कि कभी ऐसा भी होता है कि अपने समान योद्धा जो खोज रहा हो वही अगले के सामने गौण हो।

सत्य कहहि दसकंठ सब मोहि न सुनि कछु कोह।

कोउ न हमारें कटक अस *तो सन लरत जो सोह*।।

क्योंकि

प्रीति बिरोध समान सन करिअ नीति असि आहि।

जौं मृगपति बध मेडुकन्हि भल को कहइ कोउ ताहि।।

सूत्र ये है, हां ये हो सकता है कि तुम्हारे बराबरी के कोई योद्धा न हो अर्थात् तुम सर्वश्रेष्ठ हो पर ये भी हो सकता है कि तुम किसी के सामने उसी प्रकार हो जैसे मृग के राजा सिंह के सामने मेंढक। मेंढक भी तो सिंह के जैसा बैठने के नकल करता है कि नहीं? जैसे सिंह अकड़ कर बैठता है और यदि मेंढक भी उसी के नकल करे, सिंह को चुनौती दे और सिंह मेंढक से नहीं लड़े इसका ये अर्थ नहीं कि मेंढक बलवान है,और रावण राम के सामने वही मेंढक सदृश ही है कि नहीं? गोस्वामी जी ने शिव जी के माध्यम से,ताहि कि सोहइ ऐसी लराई,से संकेत करते हैं।

जहां प्रभु भक्त स्वयं को (मो समान को पातकी) नगण्य मानता है, दैन्यता के साथ रहता है वहीं अभक्त इसमें लगा रहता है कि मुझसे श्रेष्ठ कौन (कहु जग मोहि समान को जोधा)?

परिणाम?

मों ते अधिक संत करि लेखा।

सार यह है कि यदि हमारे बराबरी का कोई नहीं मिला तो केवल ये नहीं कि मैं श्रेष्ठ हूं बल्कि ये भी होगा कि वो मुझ से इतने उच्च शिखर पर पहुंच गया है कि मेरी चुनौती स्वीकार कर अपनी प्रतिष्ठा खोना नहीं चाहता  कभी भी अपनें को बड़े मनानें में भूल कर रहा है,मनुष्य गुण श्रेष्ठ व्यक्ति कभी अपनी प्रतिष्ठा खोना नहीं चाहता । इस लिए हमारी बुराई को देखकर भी अनदेखी करता है कभी सज्जन गुणों पद् पूर्ण व्यक्ति हमें मान दे रहा तो उसकी कमजोरी नहीं वल्कि उसकी महानता है। वह हमें मान दे रहा तो हमें और सम्मानित किया गया है ।