संजय शर्मा दरमोड़ा के मन की बात ‘बाबा दूधाधारी के पावन स्मरण के साथ’

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संजय शर्मा दरमोड़ा

आदि गुरु शंकराचार्य जी की पवित्र गद्दी जोशीमठ के नृसिंह मंदिर पहुंच चुकी है। इसी के साथ आदिगुरू शंकराचार्य जी की गद्दी,शीतकालीन गद्दी स्थल में विराजमान हो गई हैं। अब 6 माह तक योगध्यान बदरी और नृसिंह मंदिर में परंपरागत रूप से शीतकालीन पूजा होगी। भगवान नारायण यही पर भक्तों के दर्शन देंगे।

बाबा दूधाधारी तुम्हारी जय-जय कार हो,

नृसिंह कृष्ण औतारी तुम्हारी जय जयकार हो।

बाबा दूधाधारी…

निकली छै तू खम्भ फाडिक,

तिन प्रह्लाद बचायो।

तीनों लोकू मा धर्म थापि कि सत को अंश बढायो।

हिरण्यकश्यपु मारी तुम्हारी जय जयकार हो। बाबा दूधाधारी…

ज्योतिर्मठ का नारैण तुम्हारी जय जयकार हो। बाबा दूधाधारी…

कलजुग मा जब धर्म बिलायो सत को तेज अछायो

सत कू तेज अछायो रे बाबा, सत कू तेज अछायो

कुलदीपक कत्यूरी तुम्हारी जय जयकार हो

बाबा दूधाधारी तुम्हारी जय-जय कार हो, बाबा दूधाधारी। नृसिंह कृष्ण औतारी तुम्हारी जय जयकार हो…

प्रकट ह्वै या माया जैसे जैकी उत्पति नी चा

लगैकि समाधी बैठ्यूं चा जोगी बदरी बण का बीचा

ज्योतिर्मठ का नारैण तुम्हारी जय जयकार हो, बाबा दूधाधारी तुम्हारी जय-जय कार हो। बाबा दूधाधारी, नृसिंह कृष्ण औतारी तुम्हारी जय जयकार हो। बाबा दूधाधारी …

बह्रा,बिष्णु,शंकर छै तू, भैरों नाम च तेरू।

इच्छारूपी काया तेरी, घट-घट मा च डेरू।

भस्मीकुंड का नृसिंह तुम्हारी जय जयकार हो। बाबा दूधाधारी तुम्हारी जय-जय कार हो। बाबा दूधाधारी, नृसिंह कृष्ण औतारी तुम्हारी जय जयकार हो। बाबा दूधाधारी ….

नृसिंह को हमारी सनातन परंपरा में भगवान कृष्ण माना गया है। ऐसे बात जब उत्तराखंड की आती है तो जोशीमठ का नृसिंह मंदिर का पुण्य स्मरण हो आता है। हमारे पहाड़ों में जागर से पहले जोशीमठ जाकर तन और मन की शुद्धि की पुरातन परंपरा है। जब आदि गुरु शंकराचार्य जी की पवित्र डोली जोशीमठ के प्राचीन नृसिंह मंदिर में आई तो अनायास ही लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी जी गाया हुआ यह गढ़वाली भजन याद आ गया कि बाबा दूधाधारी तुम्हारी जय-जय कार हो…

बड़े-सयाने बताते हैं कि जिस तरह से कारगिल युद्ध के दौरान ‘कारगिल’ देश के जनमानस की जुबां पर आ गया था। ठीक उसी तरह साल 1962 में भारत-चीन युद्ध के दौरान ‘जोशीमठ’ भी देश के बच्चे-बच्चे की जुबां पर था।

जोशीमठ जहां शीतकाल में विराजमान रहते हैं भगवान नारायण

शीतकाल के लिए 19 नवंबर 2020 को बदरीनाथ धाम के कपाट अपराह्न 3:35 मिनट पर हो गए। जिसके बाद भगवान बद्री कई पड़ावों से होते हुए लोगों दर्शन देते हुए 21 नवंबर को शीतकालीन पूजा स्थल जोशीमठ पहुंचे। जहां 6 माह तक योगध्यान बदरी और नृसिंह मंदिर में परंपरागत रूप से शीतकालीन पूजा होगी। भगवान नारायण यही पर भक्तों के दर्शन देंगे।

जोशीमठ स्थित प्राचीन नृसिंह मंदिर करीब 1200 साल पुराना है और इस मंदिर की शालिग्राम पत्थर की नृसिह प्रतिमा को आदि गुरु शंकराचार्य ने स्थापित किया था। जानकार के अनुसार इस मूर्ति का निर्माण 8वीं शताब्दी में कश्मीर के राजा ललितादित्य युक्का पीड़ा के शासनकाल के दौरान किया गया और कुछ लोगों का मानना है कि मूर्ति स्वयं-प्रकट हो गयी , मूर्ति 10 इंच(25से.मी) है एवम् भगवान नृसिंह एक कमल पर विराजमान हैं|

नृसिंह मंदिर भगवान बद्रीविशाल के साथ-साथ उद्धव जी एवं कुबेर जी भी स्थापित है। यह मंदिर 68 फीट ऊंचा है। कहां जाता हैं कि इस मंदिर में स्‍थापित भगवान नरसिंह की प्रसिद्ध मूर्ति दिन प्रति दिन सिकुडती जा रही है। मूर्ति की बायीं कलाई पतली है और हर दिन पतली ही होती जा रही है। मान्यता है कि जिस दिन नृसिंह स्वामी जी की यह कलाई टूट कर गिर जाएगी, उस दिन नर और नारायण पर्वत ढह कर एक हो जायेंगे और बद्रीनाथ धाम का मार्ग सदा के लिए अवरुद्ध हो जायेगा। तब जोशीमठ से तक़रीबन 23 किमी की दूरी पर, ‘भविष्य बद्री’ में नए बद्रीनाथ की स्थापना होगी।

जोशीमठ में आध्यात्मिकता की जड़ें गहरी हैं तथा यहां की संस्कृति भगवान विष्णु की पौराणिकता के इर्द-गिर्द बनी है। प्राचीन नरसिंह मंदिर में लोगों का सालभर लगातार आना रहता है। यहां बहुत सारे पूजित स्थल हैं। शहर के आस-पास घूमने योग्य स्थानों में औली, उत्तराखण्ड का मुख्य स्की रिसॉर्ट शामिल है।