धौला क्षेत्रपाल महाराज,जिनको माना जाता है,मद्यमहेश्वर धाम का क्षेत्ररक्षक

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अभिषेक ‘गौण्डारी’

‘धौला’ स्थानीय भाषा बोली का एक शब्द है अर्थात ‘धौल्यणु’ हल्का सफेद या धवल।  मध्यमहेश्वर धाम के चारों दिशाओं में धाम/क्षेत्ररक्षक क्षेत्रपाल जी महाराज विराजमान हैं। धौला क्षेत्रपाल महाराज उन्हीं में से एक हैं।

भगवान शिव के गुप्त क्षेत्र द्वितीय केदार श्री मद्यमहेश्वर जी से 3.5 किलोमीटक की दूरी पर स्थित हैं मद्यमहेश्वर क्षेत्ररक्षक श्री धौला क्षेत्रपाल जी महाराज। इस स्थान की भौगोलिक स्थिति इस प्रकार से है कि मद्यमहेश्वर से 500 मीटर सीधी पगडंडी और 3किमी की खड़ी चढ़ाई के बाद एक बड़े पत्थर के नीचे, इस पत्थर से सटकर पत्थरों से निर्मित एक छोटा सा मंदिर है। यहाँ से मध्यमहेश्वर धाम का सम्पूर्ण दृश्य सुरम्य तरीके से दिखता है।

अगर धौला क्षेत्रपाल जी महाराज का मानवीकरण अथवा मनुष्यगुणारोपण करें तो यह कह सकते हैं कि लगभग सफेद ऊनी रंग के कपड़े जैसे सिर पर टोपी या पगड़ी और बदन में सफेद अंचल पहने हाथ में नुकीला चमकदार त्रिशूल रखे विराजमान हों। मस्तक पर चंदन का त्रिपुंड, गले में रूद्राक्ष माला  बड़ी-बड़ी आँखें पीले चमकीले सफेद रंग के लंबे केश। ऊंचा और लम्बा नाक ऊठे हुए कान,कानों में बड़े-बड़े कुंडल,हाथ और पैर में भी बड़े-बड़े कंकण। मुख पर तेज और हल्की मुस्कान।

धौला क्षेत्रपाल भगवान शिव के गण के रूप में विख्यात हैं। इसलिए इन्हें मद्यमहेश्वर धाम का क्षेत्ररक्षक माना जाता है। पूर्व में यहाँ पर सिर्फ पत्थर की शिला के रूप में भगवान धौला क्षेत्रपाल जी विराजमान थे समय के साथ इस स्थान में भी परिवर्तन हुआ। धीरे-धीरे मंदिर का विस्तारीकरण हुआ, अब सुंदर पत्थर से सजित सीधी चौकी जिस पर मूर्तियां विराजमान, त्रिशूल घंटियाँ हैं।

यहाँ पर स्थित घंटियां, भाणे, मूर्तियां और सिक्कों का कोई लिखित विवरण नहीं है। कुछ सिक्कों पर सन 1215ई0 और 1813ई०अंकित है। ऐसे ही अनेक वर्तन और भाण्डे हैं।

दादा जी कहते हैं कि घंटी(घान) और विजय भाणे की आवाज का गुंजायमान कई समय तक वातावरण में विचरण करती थी। ऐसा आभास होता था कि इस पवित्र धाम में यह आवाज हवा के साथ इधर-उधर विचरण कर रही है। यहां आबादी न के बराबर है,और इस शांत वातावरण में यह स्थान ऐसी तरंगों से मिश्रित रहता था जहाँ हवा की झोंकों के साथ घंटी, विजय भाणे और शंख की आवाज,टनटनटनाटन…. पूउउ भांआं… भांआं पू पूउउ भांआं…. की आवाज/धुन मद्यमहेश्वर धाम सहित सर्वत्र विद्यमान रहती थी। यह आवाज ऐसा एहसास दिलाती थी कि इस सुरम्य और सुंदर प्रकृति में देवताओं का वास है।

दादा जी कहते हैं कि पूर्व में मद्यमहेश्वर धाम में अधिक आबादी नहीं थी। प्रधान पुजारी और बारीदार के अतिरिक्त शायद ही कोई, उस समय पर अनेक ऐसी गतिविधियों का समागम प्रकृति में होता था। श्रावण मास के दक्षिणायन प्रथम दिवस पर यहाँ जय विजय पुष्प अर्पित किए जाते हैं और विशेष पूजा की जाती है। नवरात्रि के अवसर और दीपावली के दिनों में भी भगवान धौला क्षेत्रपाल जी महाराज जी के पूजन की पूर्व परम्परा है यह पूजा नियुक्त बारीदार (बारी वाला) द्वारा की जाती है। इसके अतिरिक्त भक्तगण कभी भी धौला क्षेत्रपाल जी की पूजा कर सकते हैं। ऐसी मान्यता है कि जब बारीदार मद्यमहेश्वर धाम के लिए ब्रह्मकमल लाते हैं तो पाँच ब्रह्मकमल धौला क्षेत्रपाल जी महाराज के नाम के लाये जाते हैं।

भेड़-पालकों अथवा पालसियों द्वारा भी इस परम्परा का निर्वहन किया जाता है। वे भी धौला क्षेत्रपाल जी के नाम से ब्रह्मकमल लाते हैं। ऐसी मान्यता है कि भगवान धौला क्षेत्रपाल जी को घी और शक्कर मिश्रित आटे का रोट और हलवा का भोग लगाया जाता है। यह रोट खडक अथवा चाकू से काटा जाता है इसका विशेष महत्व है। केदार वैराग्य पीठ के प्रथम रावल श्री जगद्गुरुः भुकुण्ड लिङ्गं शिवाचार्य जी द्वारा श्री धौला क्षेत्रपाल महाराज का जीर्णोद्धार कर सर्वप्रथम मूर्ति स्थापना की गई थी।

अस्वीकरणीय-: लेख में प्रयुक्त बातें एक पौराणिक मान्यता का अंग है। ये बातें लिखित प्रमाण पर आधारित नहीं है। इनका  उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ सभ्यता पर आधारित बातों और पौराणिक मान्यताओं को बनाये रखना है। साथ ही साथ कथावाचक यह दावा नहीं करता कि इस विषय में सिर्फ यही कथा प्रचलित है, इसके अतिरिक्त  कोई अन्य बातें /पौराणिक मान्यताएं भी हो सकती हैं।

(जानकारी साभार :-श्री आलम सिंह पंवार,गौण्डार(दादा जी 81 वर्षीय)। दादा जी इन बातों को शत-प्रतिशत सत्य घटना पर आधारित होने का दावा नहीं करते हैं। दादा जी कहते हैं कि पुराने लोग अनेक ऐसी गतिविधियों के आभास होने का दावा करते थे जो इस पवित्र क्षेत्र में भगवान के विद्यमान या रक्षक का संदेश देते थे।    

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