‘मालिनी का आंचल’ डीएन भटकोटी की शकुंतला-दुष्यंत की प्रणय-कथा पर आधारित काव्य-कथा

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1967
लेखक मित्रों के साथ डीएन भटकोटी
ललित मोहन रयाल

अभिज्ञान शाकुंतलम् कालिदास प्रणीत नाटकों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है. संस्कृत आचार्यों ने संकेत दिए हैं- काव्येषु नाटकं रम्यं, तत्र रम्या शकुंतला. काव्यों में नाटक श्रेष्ठ है और उसमें शाकुंतलम्. इस नाटक के चतुर्थ अंक और चतुर्थ श्लोक के तो क्या कहने।

अभिज्ञान शाकुंतलम् के प्रति अधिकांश लोगों के आकर्षण का दूसरा कारण है। राजा रवि वर्मा की पेंटिंग्स पीछे मुड़कर देखती शकुंतला, दुष्यंत की याद में शकुंतला, भाव-चित्रों को आप बस एक बार देख लें तो फिर उन छवियों को विस्मृत नहीं किया जा सकता। ‘मालिनी का आंचल’ काव्य-कथा में कवि ने मालिनी नदी को प्रमुखता दी है और उसके उद्गम स्थल मलनिया के अपवाह-क्षेत्र को काव्य का कथा-प्रदेश बनाया है।

मेनका द्वारा छोड़ी गई शिशु-कन्या की शंकुतों (पक्षियों) ने रक्षा की, जिस आधार पर उसका नामकरण शकुंतला हुआ। इस रचना में प्राकृतिक दृश्य बहुतायत में हैं। यह वह स्थल है, जहां फेन उगलती मालिनी नदी समतल प्रदेश में उतरती है। ‘परिवेश’ नामक सर्ग में महाबगढ़, भरपूर एवं कण्वाश्रम सहित भाबर प्रदेश का सम्यक् निरूपण हुआ है। यही वह सदानीरा मालिनी है, जिसके तट पर उस वनबाला का बचपन बीता। जहां एक ओर शाकुंतलम में भ्रमर शिरीष के फूलों का पराग चखते हैं तो यहां बच्चे बासिंगे के सफेद फूलों का मीठा रस चूसते हैं, उनके फूलों की मुर्खी पहनते हैं। यह भाबर की बालसुलभ चेष्टाएं हैं।

‘रेतीले तट’ में वे हुनरमंद लोगों की उद्यमशीलता का जिक्र करते हैं, रह- रहकर ढोल सागर के नाद-सौंदर्य को याद करते हैं. उदारीकरण से पूर्व के समाज को याद करते हुए पलायन पर विमर्श करते हैं. कुछ बातें वे प्रतीकों में कह जाते हैं:

 जोड़ अतीत को वर्तमान से

 प्रवासी हुआ दुष्यंत

 बाट जोहती दिन गिनती

 थकी शकुंतला खेतों में.

व्यष्टि से समष्टि की पुनरावृत्ति काव्य में कई बार हुई है, यह आवृत्ति सायास प्रतीत होती है, जो कवि के उदात्त विचारों की द्योतक है। कवि एक पौराणिक कथा को जिसे उन्होंने मूल पुरुष गंगाराम(जिन्हें रावत ठाकुर इस घाटी में लेकर आए थे) की परंपरा में प्रवीण ददा से सुना था, को शाकुंतलम् कथा के पुनर्मिलन से आगे ‘अतिमानस’ और ‘देश काल’ तक ले जाते हैं. यह कविता का वो हिस्सा है, जो मानव मन की अंत:वृत्तियों के क्रमिक उन्मीलन का चरम है. वैसे तो काव्य की दृष्टि से समूची काव्य-कथा ही चिंतन प्रधान है, जो भावी पीढ़ी को महान् संदेश देना चाहती है। कवि पौराणिक कथा के क्रम में प्रणय, विवाह, विरह, प्रत्याख्यान, पुनर्मिलन के मुख्य हिस्सों को संवाद के जरिए आगे बढ़ाते है।

‘भरत-भारत’ और ‘ऊर्ध्वपथ’ उपशीर्षकों में काव्य का परिपाक इस रचना का चरम है और इस कविता का मूल स्वर भी समस्त जीवों का कल्याण ही कवि का ध्येय और प्रेय है। पृष्ठों की गिनती के लिहाज से यह रचना कामायनी के आकार की हो जाती है।

प्रकाशक- समय साक्ष्य

फालतू लाइन,देहरादून

मूल्य-₹ 120/-