
आजकल एनेक्सी,इंटर नेशनल सेंटर,नई दिल्ली के सबसे नीचले तल में अद्भुत चित्र प्रदर्शनी चल रही है। मुझे इसके उद्घाटन और चित्रों पर आयोजित कार्यक्रम में कई वक्तव्यों को सुनने और उस संदर्भ में हिमालय को समझने का मौका मिला। इस चित्र प्रदर्शनी का आयोजन ‘पहाड़ ‘और इंडिया इंटर नेशनल सेंटर के संयुक्त तत्वाधान में किया गया है। यह प्रदर्शनी सामान्य प्रदर्शनियों जैसी न होकर विशेष है। ये चित्र आज के या आज से दस बीस साल पहले के नहीं है। इनका सृजन 170 साल पहले सन् 1854 से 1856 के बीच तीन जर्मन भाइयों क्रमशःरॉबर्ट,हर्मन और एडॉल्फ स्क्लेजिनविट द्वारा किया गया था। जिन्हें ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत सहित एशियाई देशों के कई भागों के सर्वे का दायित्व सौंपा था।

यह वह दौर था जब आज की भांति डिजिटल फोटोग्राफी नहीं थी, कैमरे का चलन आजकी तरह नहीं था। आवागमन के साधन नहीं होते थे। यात्रा पैदल,घोड़े,खच्चर और नावों से की जाती थी। ग्लेशियर को पार करना आसान नहीं होता था। संचार माध्यम भी आज जैसे नहीं होते थे। ये तीनों जर्मन भाई जहां भी पहुंचते, वहां मन भावन दृश्यों को कैनवस पर उतारते रहते थे।इनके रंग वही होते थे जैसा रंग अपनी आंखों से देखते थे,वे सभी रंग प्राकृतिक होते थे। उनका यह बड़ा श्रमसाध्य कार्य होता था।
यह चित्र प्रदर्शनी एक धरोहर है।जिसे अब संभालकर रखना होगा दृश्य चित्र रूप में तथा स्मृति चित्र रूप में। इन चित्रों से हम अपने अतीत को ही नहीं समझते,हिमालय को नए परिपेक्ष में समझने की कोशिश में सहायक आधार सामग्री के रूप में भी ले सकते है। हिमालयी जीवन,जीवन शैली और हमारे जीवन पर पड़ने वाले दबावों को समझने को इसका विशेष महत्व अंकित कर सकते हैं। हिमालय दुनिया में एक है,जिसका विस्तार कई देशों फैला हुआ है। हिमालय जो भारतीय जीवन दर्शन का सबसे बड़ा स्रोत है,जहां से जीवनदायनी नदियां कलकल छलछल का निनाद करती प्रवाहमान रहती हैं।वही हिमालय जो हमें सबसे अधिक प्राण वायु देता है। इसकी उपादेयता हमारा भौतिक विकास के साथ-साथ आध्यात्मिक चेतना का सबसे बड़ा सतत् स्रोत के रूप में समझी जाती है। दोनों दृष्टियों से हिमालय हमारे जीवन से जुड़ा है।

जब मैं इन चित्रों का अवलोकन कर रहा था उनमें कुछ चित्र ऐसे भी थे जिनके विषय में या तो सुना था या फिर किताबों में पढ़ा था। चित्रों को देखते जब मैं आगे बढ़ रहा था,एक दृश्य चित्र मेरी स्मृति में मुझे उद्वेलित करने लगा। वह चित्र था फिल्लौर गांव का। इसके बारे में पढ़ा था और सुना भी था किंतु देखा नहीं था। हम सभी भारतीय किसी न किसी रूप में भारतीय जीवन शैली में आध्यात्म के महत्व को समझते हैं या फिर उससे अपने को जड़ पाते हैं,यह किसी से छुपा नहीं है। “ॐ जय जगदीश हरे “प्रार्थना करणों करोड़ों भारतीयों की आस्था,विश्वास,लोक कल्याण की भावना की अभिव्यक्ति की प्रार्थना है। इस प्रार्थना की रचना श्रद्धा राम फिल्लौरी ने की थी, और वह इसी फिल्लौर के निवासी थे। आध्यात्मिक चेतना की इस अद्वितीय,अनमोल रचना के विषय में आज कितने लोग जानते होंगे।मैं इसका केवल अनुमान ही लगा सकता हूं।
उस फिल्लौर का चित्र देखकर मन को अच्छा लगा। दूसरा यहकि मैने अपने उपन्यास “बत्तीस राग गाओ मोला” में महान चित्रकार मोला राम के रंग कला कौशलता था रंग निर्माण कला को विस्तार से बताने का प्रयास किया था, उनके भव्य रंग निर्माण कला की पुष्टि भी इन चित्रों के रंगों से होती है। यह उस काल खण्ड के रंग प्रयोग का समर्थन ही है।
बहरहाल बात चित्र प्रदर्शनी से हिमालय को जानने के साथ-साथ यह एक्सप्लोरर पंडित नैन सिंह रावत के जटिल जीवन को समझने और समझाने की दृष्टि से भी महत्व रखती है। तीन जर्मन भाइयों के साथ एक कूली के रूप में काम करते नैन सिंह रावत का जीवन असाधारण विकट परिस्थितियों के साथ शुरू हुआ। वह अपनी बुद्धि,विवेक और कर्मठता से पंडितों के पंडित बने यह जानना बड़ा दिलचस्प है।

पंडितों के पंडित नैन सिंह रावत बनने और उनका प्रेरणादाई किस्सा सुनने और उसे आम जन तक पहुंचाने का श्रेय जाता है प्रो शेखर पाठक को,जिन्हें हम शेखर दा संबोधित करते हैं। प्रो शेखर दा का साल 2015 में म्यूनिख,जर्मनी में वक्तव्य देने जाना नहीं होता तो संभवतःइन दुर्लभ चित्रों के महत्व को हम नहीं समझ पाते।भारतीयों को अपने महान हिमालय के उस कालखंड को अभिलेख के रूप में जानने का अवसर नहीं मिलता। उनकी दस साल की भागमभग के बाद यह दृश्य चित्र प्रदर्शनी संभव हुई है।
इसके लिए शेखर दा को साधुवाद और उनकी कर्मठ टीम के सदस्य,जिसमें प्रमुख रूप से चंदन डांगी,कमला कर्नाटक,खुशहाल सिंह रावत,हृदेश जोशी,के सी पांडे जैसे सहयोगियों को हार्दिक बधाई। यहां कुछ चित्र दे रहा हूं। उम्मीद है आपको भी बहुत कुछ सीखने का लाभ मिलेगा।इस चित्र प्रदर्शनी को देखने को युवा पीढ़ी को प्रेरित करेंगे।

















