रिस्पना नदी के बहाने,रिस्पना की खोज

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जयप्रकाश पंवार ‘जेपी ‘

बड़ी-बड़ी नदियों को बचाने के लिए बड़े-बड़े नाम एक बार फिर पुनः मैदान में आ गये है। विज्ञान कहता है कि बड़ी नदी सैकड़ों छोटी-बड़ी नदियों के जल से ही बड़ा अखित्यार करती है। उत्तराखण्ड में ऐसी सैकड़ों छोटी-छोटी नदियॉ, गाड व गधेरे है आज जिनका अस्तित्व खतरे में है। लेकिन इन छोटी नदियों को बचाने की कोई बात नहीं करता। देहरादून को जीवन देने वाली नदियों पर आज संकट है। कई वर्षों से रिस्पना नदी को बचाने के अभियान में लगे आन्दोलनकारी व जन कवि डॉ0 अतुल शर्मा कहते हैं कि छोटी-छोटी नदियॉ ही हमारे समाज की जीवन धारा हैं जो लोगों की प्यास बुझाती है। खेती व किसानी इन्हीं नदियों के सहारे चलती है। लेकिन इन नदियों को बचाने की कोई बात नहीं करता व इसलिए नहीं करता क्योंकि इनसे प्रचार के भूखे लोगां की प्यास नहीं बुझाती इसलिए वे बड़ी नदियों को बचाने की बात करते है। आजकल डॉ0 शेखर पाठक के नेतृत्व में सुदूर नेपाल की सीमा से लगे असकोट से हिमाचल की सीमा पर स्थित आराकोट की यात्रा चल रही है, जो हर 10 वर्ष के अन्तराल पर सतत रूप से आयोजित की जा रही है। इस बार यह भी प्रयास किया गया है कि आसकोट-आराकोट के पारम्परिक यात्रा मार्ग के इतर भी छोटी-छोटी यात्रायें की जाय। जब असकोट-आराकोट की देहरादून में बैठक हुई तो यह निर्णय लिया गया कि स्थानीय नदियों की स्थितियों को भी जाना जाये। इसी सन्दर्भ में मैंने अपने साथियों के साथ मुख्य रूप से रिस्पना नदी की खोजबीन शुरू की।

रिस्पना नदी के जलागम क्षेत्र के अध्ययन के लिए हमने अपनी यात्रा की शुरूआत भट्टा गॉव से की। भट्टा फॉल आज एक प्रसिद्व टूरिस्ट स्पॉट है। उल्लेखनीय है कि इसी नदी पर मसूरी को सर्वप्रथम बिजली प्रदान करने वाली ऐतिहासिक ग्लोनी पावर हाउस बना हुआ है जो आज भी बिजली उत्पादन कर रहा है। मेरे साथ इस अध्ययन यात्रा में 2 पर्यावरण विशेषज्ञ भी थे। प्रसिद्व पर्यावरण विद्व व मैती आन्दोलन के संस्थापक श्री कल्याण सिंह रावत व हिमालयन यूनिवर्सिटी की पर्यावरण विशेषज्ञ डॉ0 नन्दा नौटियाल ने भट्टा नदी का बारीकी से अध्ययन करने में विशेष सहयोग दिया, जोकि इस यात्रा के अन्त तक मेरे प्रमुख साथी थे। भट्टा फॉल बहुत ही रमणिक व सुन्दर स्थल है लेकिन उत्तराखण्ड जल विद्युत निगम लिमिटेड के अधीन इस हेरिटेज स्थल की दुर्दशा देखते ही बनती है। पहाड़ी राज्य को विद्युत का प्रमुख क्षेत्र मानने वाले अपनी ऐतिहासिक विद्युत उत्पादक स्थल का अगर ऐसा हस्र कर रहे हैं तो इनसे क्या उम्मीद की जा सकती है। इसे सुन्दर भ्रमण स्थल के रूप में विकसित किया जाना चाहिये। कुछ वर्ष पूर्व इसके लिए प्रयास किये गये थे लेकिन आज यहॉ झाड़ियॉ ही झाड़ियॉ उगी हुई हैं। पॉलीथीन, प्लास्टिक बोतलों व अन्य कूड़े के निस्तारण की समुचित व्यवस्था नहीं है। लिहाजा पूरी नदी में प्लास्टिक व प्लास्टिक बोतलें भरी पड़ी हैं। भट्टा फॉल भी कैम्पटी फॉल जैसा ही है लेकिन इस पर खास ध्यान नहीं दिया गया है। जबकि आज कल यहॉ भी काफी पर्यटक गरमी से बचने के लिए यहॉ घूमने के लिए आते है। स्थानीय गॉवों के लोगों की सहभागिता से पर्यटन समीति बनाकर इसे विकसित कर रोजगार से जोड़े जाने की अपार संभावना है। यह भट्टा नदी आगे जाकर तमसा नदी में मिलकर पुनः आगे जाकर यमुना के जल में अपना योगदान प्रदान करती है। भट्टाफॉल के विपरीत जलागम क्षेत्र में झड़ी-पानी का क्षेत्र है। जहॉ से देहरादून का विहगंम दृश्य दिखाई देता है।

दरअसल यही रिस्पना नदी का मूल जलागम क्षेत्र है। राजपुर से मसूरी के लिए पूर्व में यहीं से पैदल रास्ता था जब मसूरी के लिए मोटर मार्ग नहीं हुआ करता था। आज भी यह मोटर मार्ग सुरक्षित है। इस पैदल मार्ग को ट्रैकिंग मार्ग के रूप में प्रचारित किये जाने की जरूरत है। इस जलागम क्षेत्र के ऊपरी इलाके में बांझ, बुरॉस व इसके नीचे चीड़ के पेड़ है। जबकि सबसे निचले क्षेत्र में साल ब शीलम आदि वृक्ष हैं। रिस्पना की ढुंढ खोज में दूसरे दिन हमने राजपुर के पृष्ठ भाग में रिस्पना नदी से प्रारम्भ की यहॉ से पेयजल की मोटी पाइप लाइन लगी है जो देहरादून शहर की प्यास बुझाती है। यहॉ ठीक पुरानी पाइप लाईन के बगल से नई पाइप लाईन का भी निर्माण किया गया है। पेयजल की लगातार बढ़ती मॉग का यह परिचायक है। यहॉ गाड़ियों में इस नदी पे टैकरां में भरकर भी लोगों को पानी ले जाते हुए देखा। रिस्पना यहॉ बहुत ही शान्त है जिस पर पानी की मात्रा ना के बराबर है। जैसे-जैसे यहॉ से रिस्पना आगे बढ़ती है इसका विस्तार बढ़ता चला जाता है। नदी के दोनों ओर खेती है जो अब लगातार सिमटती जा रही है। यहॉ नहरें बनी हुई हैं। पूर्व में यहॉ बहुत घराट थे जो अब बॅजर पड़ गये हैं। खेती की जमीनों पर अब कंक्रीट के जॅगल उगने लगे हैं। सहस्रधारा की ओर बढ़ते हुए ऋषिपर्णा सेतु बना हुआ है। रिस्पना को ही ऋषिपर्णा कहा गया है। यहॉ नदी के दोनों ओर भारी भरकम अतिक्रमण हो गया है। यहॉ झुग्गी-झोपड़ी व पक्के मकान नदी को घेरकर बन गये हैं। यहॉ रिस्पना नदी में पानी सूख गया है। लेकिन बरसात में जब नदी में पानी बढे़गा तो यह बस्ती आपदा से त्रस्त होगी लेकिन इस ओर प्रशासन ने ऑखें मुॅद रखी हैं। कुछ आगे जाकर इस नदी से नहरें काट ली गई हैं। ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर पृथ्वी पति साह की माता रानी कर्णावती ने रिस्पना नदी पर विशाल नहरों का निर्माण कर दो प्रमुख नहरें देहरादून शहर के बीचों-बीच पहुॅचाकर कृषि जिसमें बासमती चावल की खेत, लीची व आम के बाग व साग-सब्जियों की पैदावार को प्रोत्साहित किया गया था। आज जिसे ई सी रोड़ कहते हैं यह कभी ईस्ट कैनाल रोड़ अर्थात यह सड़क नहर के साथ-साथ चलती थी जिस पर अनेक घराट बने हुऐ थे। लोग इस नहर से खेतों की सिंचाई, पेयजल आदि उपयोग करते थे। काश यह नहर खुले रूप से बहती तो देहरादून का वातावरण कितना सुखद व निर्मल होता। इसी प्रकार देहरादून के हृदय स्थल से वेस्ट केनाल वर्तमान जी0 एम0 एन0 रोड़ के साथ-साथ बहती है। लेकिन आज दोनों नहरें भूमिगत हो गई हैं। व इन नहरों के ऊपर पक्की सड़कें बना दी गई है। साथ ही इन नहरों के किनारे बनी खेती समाप्त होकर कंक्रीट के जंगलों में तब्दील हो गई है। सहस्रधारा नदी जलागम क्षेत्र के अध्ययन में हमारे दो साथी सिदार्थ नेगी व शैलेन्द्र भण्डारी भी जुड़ गये थे। सहस्रत्रधारा एक प्रमुख पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हो गया है। यहॉ नदी पर स्थानीय ग्रामीणों ने छोटे-छोटे तालाब बना दिये थे। साथ ही यहॉ होटल, रेस्तरॉ खुलकर स्थानीय लोगों आर्थिकी में योगदान दे रहे हैं। 

गर्मियों के मौसम में कुछ खास महिनों में ही सीमित रोजगार लोगों को मिल पाता है। इसका प्रबंधन एक स्थानीय समीति के माध्यम से किया जाता है जिसका राजस्व जिला पॅचायत निधि में बढोत्तरी कर रहा है। सहस्रत्रधारा की इस नदी पर भी संकट बढ़ रहा है। नदी के दोनों ओर लगातार अतिक्रमण बढ़ता जा रहा है। खेती की बहमुल्य जीवन यहॉ भी भूमाफियाओं की भेंट चढ़ती जा रही है। सहस्रत्रधारा से गुजरने वाली यह नदी बल्दिया के नाम से जानी जाती है। इस पर सिंचाई विभाग द्वारा काफी बड़ी नहर बनाई जा रही है जो खेती की सिचॉई काफी सहयोगी है। मसूरी-धनोल्टी जलागम क्षेत्र में आने वाली सौंग नदी मालदेवता में बल्दिया नदी में मिल जाती है। यहॉ से यह नदी फिर सौंग नदी के रूप में जानी जाती है जो डोईवाला के निकट से गुजरती है। भ्रमण के दौरान नदियों के अध्ययन से पता चला की मालदेवता के आस-पास इस नहर पर काफी घराट बने हुये थे लेकिन अब वे बन्द हो चुके हैं। व नहर को यहॉ भी भूमिगत कर दिया गया है। इस पूरी घाटी में नदियों से पत्थर रेता बजरी का चुगान किया जा रहा है। यह पूरी नदी ठेकेदारों व नेताओं के लिए सोने का अंडा देने वाली मुर्गी है। मालदेवता का यह ईलाका पाइराइट-फास्पेट युक्त खनिजों से भरा पड़ा है। पूर्व में यहॉ पाइराइट-फास्पेट कारपोरेशन लिमिटेड कम्पनी द्वारा पाइराइट व फास्पेट का उत्पादन किया जाता था। जिसे अब पर्यावरण दृष्टिकोण से बन्द कर दिया गया है।

मसूरी व देहरादून में उच्चकोटी का लाइम स्टोन, चूना, पाइराइट-फास्फेट की खूब खदानें थी जो अब बन्द हो चुकी है। 1991 में मैंने भूगर्भ विज्ञान का छात्र होने के नाते इस इलाके का भूगर्भीय सर्वेक्षण व अध्ययन भी किया था। उस वक्त पाइराइट-फास्फेट की खुदाई अपने अन्तिम में थी। हमने उस वक्त सुरंगों के अन्दर जाकर खदान का कार्य भी देखा था। अब यह इतिहास की बात हो गई है। असकोट-आराकोट अभियान की इस समान्तर यात्रा में हमारा अगला पड़ाव बना गुच्चुपानी। यह भी आज एक प्रमुख पर्यटन स्थल के रूप में विकसित होकर स्थानीय लोगों की आर्थिकी में सहयोग कर रहा है। यहॉ भी नदियों में प्लास्टिक का खूब कूड़ा-कचरा देखने को मिला – गुच्चु नदी आगे बढ़कर तमसा के रूप में जानी जाती है। इसी के किनारे एक और प्रमुख धार्मिक व पर्यटन स्थल के रूप में टपकेश्वर मन्दिर अवस्थित है। यह आगे जाकर कुल्हाल के पास आयन नदी में मिल जाती है जो यमुना की एक और प्रमुख सहयोगी नदी है। जिसको मसूरी के विशाल जलागम क्षेत्र से पानी की आपूर्ति होती है। रिस्पना नदी के बहाने हमारे यात्री दल ने देहरादून के जल क्षेत्रों का अध्ययन किया। राजपुर के पास से निकलने वाली नदी विंदाल की स्थिति भी बहुत बदतर है इस पर इतना अतिक्रमण हो गया है कि कहीं-कहीं नदी दिखती ही नहीं। यह नदी गंदे नाले के रूप में बहती है जिसके निकट आप ज्यादा देर खड़े नहीं हो सकते। यह इतनी ज्यादा प्रदूषित है कि आपको नाक पर रूमाल रखना पड़ता है।

कनॉट प्लेस के अन्त से गुजरती हुई यह कारगी चौक के पास होती हुई मोथरा वाला इलाके से धोबी घाट पहॅुचकर रिस्पना में मिल जाती है। दूसरी ओर रिस्पना के साथ-साथ बढ़ते हुए रायपुर-नेहरू कॉलोनी-विधानसभा भवन से आगे दून यूनिवर्सिटी से गुजरती रिस्पना की हालत बहुत खराब है। इस पूरे इलाके में रिस्पना पर जबरदस्त अतिक्रमण जारी है। इसके दोनों किनारों पर झुग्गी-झोपड़ीयों से लेकर, भवन, कॉलोनी व कई सरकारी प्रतिष्ठान बन गये हैं। यहॉ निर्माण कार्य लगातार जारी है। बरसात में जब रिस्पना विकराल रूप ले लेती है तो उसमें भविष्य में आने वाले खतरे की ओर संकेत दे ही देती है। मुख्य रूप से विधानसभा भवन, प्रसार भारती भवन, दून विश्वविद्यालय परिसर सहित झुग्गी बस्ती व अन्य वसावटों पर बरसात में खतरे की घंटी बंधी रहेगी। दून विश्वविद्यालय की सीमा से गुजर कर रिस्पना अब आगे जाकर बिंदाल में मिल जाती है। अब यहॉ से दोनों नदी अपना मूल नामों को छोड़कर शुशवा नदी का नाम धारण कर लेती है। यहॉ यह नदी अब गंदे नाले के रूप में बहकर आगे बढ़ जाती है। शुशवा नदी के दोनों किनारों पर भी निर्माण कार्यों का भारी दबाव बना हुआ है। यहॉ भी कृषि भूमि अब आवासीय कालोनियों में तब्दील होती जा रही है। शुशवा दुधली गॉव होते हुए नेपाली फार्म के निकट पुनः सांग नदी में मिल जाती है। यहॉ ये आगे बढ़कर ये फिर गंगा नदी में मिल जाती है। इससे आप एक अंदाजा आसानी से लगा सकते हैं कि देहरादून का पूरा कूड़ा-कचरा इन नदियों के सहारे गंगा नदी में मिलकर प्रदूषण बढ़ाने में एक बड़ा योगदान करता है। डा0 अतुल शर्मा कहते हैं कि गंगा के निकट आते-आते इन नदियों के पाट हर वर्ष चौड़े होते जा रहे हैं इनमें पानी गायब हो गया है। ये नदियॉ पत्थरों की नदियॉ बन गई हैं। नदियॉ सिकुड़ी हैं, लेकिन पत्थरों का विस्तार बढ़ा है। और इन पत्थरों की नदियों के ऊपर पुल बने हैं। दुश्यन्त कुमार लिख गये हैं। –
‘‘बाढ़ की सम्भावनायें सामने हैं।
और नदियों के किनारे घर बने हैं।‘‘

लेखक स्वतंत्र पत्रकार व डाक्यूमेंट्री फिल्ममेकर हैं

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