उत्तराखंड में आखिर क्यों हुई 81 डॉक्टरों की सेवाएं समाप्त ?

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उत्तराखंड स्वास्थ्य सेवाओं की लचर व्यवस्थाओं से हमेशा से जूझता रहा है। मैदानी क्षेत्रों को छोड़ दिया जाए राज्य में सरकारी अस्पतालों में डिलीवरी के लिए आने वाली गर्भवती महिलाएं या तो इलाज के अभाव में दम तोड़ देती है या फिर जान जोखिम में डालकर दाई या स्टाफ नर्सों से डिलीवरी कराती हैं। यही हाल आम लोगों का भी है।

उत्तराखंड में आज स्थिति यह हैं कि स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव में वहां के लोगों का जीवन हर दिन मौत की आगोश में चला जाता है। पहाड़ी क्षेत्रों में यह स्थिति और दयनीय है। इसकी एक वजह यह भी हैं कि उत्तराखंड में कार्यरत अधिकतर डॉक्टर पहाड़ी क्षेत्रों में जाना ही नहीं चाहते। इसी का नतीजा हैं कि उत्तराखंड प्रशासन को ऐसे डॉक्टरों को खिलाफ सख्त कार्रवाई करते हुए। उत्तराखंड में लंबे अरसे से गैरहाजिर चल रहे 81 डॉक्टरों की सेवाएं समाप्त कर दी है।

शासन द्वार जारी आदेश के अनुसार जिन डॉक्टरों की सेवाएं समाप्त की गई है। उनमें अधिकांश डॉक्टर वह है जो पहाड़ी क्षेत्रों कार्यरत थे। जो पिछले कई दिनों से इन क्षेत्रों बने स्वास्थ्य केंद्रों पर सेवाएं दे ही नहीं रहे है। जिन्हें तत्काल प्रभाव से हटा दिया गया है। इन गैरहाजिर डॉक्टरों की सेवा समाप्त होने के बाद अब इन पदों पर नए डॉक्टरों की नियुक्ति की जा सकेगी।

इस बारे में प्रभारी सचिव स्वास्थ्य डॉक्टर पंकज कुमार पांडेय की ओर से जारी आदेश के अनुसार जिन डॉक्टरों की सेवाएं समाप्त की गई है। उनमें पौड़ी जिले में 13,नैनीताल में 10 चमोली,अल्मोडा के 9-9 देहरादून के 8 रूद्रप्रयाग- ऊधमसिंह नगर के 6-6 उत्तरकाशी के 5 पिथौरागढ़ के 4 चंपावत के 3 बागेश्वर के 1 और हरिद्वार के 2 डॉक्टर शामिल हैं,जिनकी सेवाएं समाप्त की गई है।

प्रशासन के अनुसार जिन अस्पतालों से डॉक्टरों की सेवाएं समाप्त की गई है। उन अस्पतालों में डॉक्टरों के अभाव में स्वास्थ्य सेवाएं गड़बड़ाए नहीं। इसके लिए इन अस्पतालों जल्द से जल्द नए डॉक्टरों की नियुक्ति की जाएगी।