लेखकों के संघर्षों का कैनवास ‘मेरा कमरा’

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डॉ.अतुल शर्मा

कोरोना संक्रमण के दौरान लॉकडाउन के दिनों में लेखक-पत्रकार प्रबोध उनियाल के संपादन में ‘मेरा कमरा’ किताब का आना एक सुखद आश्चर्य रहा। इस दौर में काव्यांश प्रकाशन ने लेखकों और पाठकों को एक अच्छे विषय पर किताब प्रदान करने की पहल की। इस पुस्तक में 40 लेखक शामिल किये गये हैं। सबने अपने-अपने अहसास इस में उकेरे है। कहीं अपने कमरे की निजता पर चर्चा की गई हैं तो कहीं इसके बहाने से बीते दिन याद किये गये। अर्थात संघर्षों के मायने उकेरे है पुस्तक मेरा कमरा।

मेरा कमरा में एकांत का अकेलापन उभरा तो कहीं साहित्यिक केन्द्र का त्रासद टूटना दिखा तो कहीं 100 साल पुराने घर का अपनापन सामने आता है। इस पुस्तक के बहाने कई लेखक-पत्रकार और कवियों ने अपनी जिंदगी के कमरे का जिक्र किया तो किसी ने बीसवें मकान का कोना याद किया है। इस में संदूक वाला कमरा और जब अपना कमरा आकाश हो    उसके अस्तित्व की चर्चा भी उभर आई है।

मेरा कमरा के माध्यम से लेखक-कवि-पत्रकार प्रबोध उनियाल ने उन लेखकों,पत्रकारों और कवियों के जीवन की उस पीड़ा को इस पुस्तक के पन्नों में समेटा है। जो अक्सर खुद के  जीवन की तलाश में जीवन की यात्रा पर निकलते है। लेकिन अंत में जीवन क्या उसे समझने के लिए उन्हें पूरा जीवन लग जाता है। ‘वह अपना कमरा’,प्रबोध उनियाल, ‘उस एकान्त का अकेलापन’,गंगा प्रसाद विमल,‘जहां मेरे लेखक ने जन्म लिया’,सुरेश उनियाल,’किसको कहूं,मेरा कमरा’,गंभीर सिंह पालनी,’जिंदगी के कमरे से होकर गुजरती दुनिया’,शिवप्रसाद जोशी,’पुराने घर की सूरत टटोलता हूं’,एच.सी.पाठक,’कमरे का कंसप्टे सोचकर अच्छा लगता है’,गूरूचरन,’मेरे पढ़ने लिखने का कमरा’,अनिल कार्की और ‘साहित्य साधक का कमरा’,प्रीति बहुखंडी जैसे लेखकों ने अपने कमरे के बहाने अपने जीवन के उस कैनवास पर संघर्ष,जीवटता और वास्तविक जीवन की परिभाषा को उकेरा है। जिन्हें एक बार पढ़ने के बात बार-बार पढ़ने का मन करता है। इसके लिए निश्चित तौर पर प्रबोध बधाई के पात्र है।

इस किताब में विषय बहुत विभिन्न तरह से सामने आये है। किसी ने कई कमरों में गुजरी जिन्दगी तो किसी ने कमरे को मां की सीख से जोड़ दिया है। पुराने घर की सूरत टटोलने से लेकर कमरा आज भी सपना है की बात करता है। कोई किताब के कमरे में हैं तो,कोई मिट्टी की महक वाले कमरे में,किसी ने एक कमरा बने न्यारा कहा और साथ ही किसी ने लेखन की जगह का जिक्र किया है। युवा कवि जगमोहन ‘आज़ाद’ का कमरा ‘वजूद का हिस्सा है वह कोना’,आंखे नम् कर गया है। दरअसल में पहाड़ के वजूद को खुद में समेट जब पहाड़ व्यक्ति खुद के जीवन के तलाशने के लिए अपने खेत-खलिहानों से निकलता हैं तो निश्चित तौर पर पहाड़ हमेशा उसके वजूद का हिस्सा रहते है। इसी तरह महेश चिटकारिया का ‘बिना खिड़की का कमरा’,जीवन के विविध आयामों को खुद में समेटे हुए है। दिल और दिमाग की वर्कशॉप और मेरा कमरा,मेरा साथी के साथ कुछ ने दीवारों से बातें करने की बात कही है,किसी ने अपना कोना ढूंढ लिया और कमरों के साथ बदलाव का जिक्र किया है।

यह पुस्तक उस दौर में आई है जब कोरोना संक्रमण के चलते हम अपनों से दूर हुए। इस बीमारी ने रिश्ते-नातों के बीच एक बहुत बड़ा गैप बना दिया। लेकिन प्रबोध ने इन रिश्तों को एक कमरे में समेट कर इस गैप को हमेशा के खत्म कर दिया है। जिसके लिए मैं उनियाल जी को बधाई देता हूं।

डॉ.गंगा प्रसाद विमल,डॉ अतुल शर्मा,सुरेश उनियाल,गम्भीर सिंह पालनी,शिवप्रसाद जोशी  मदन शर्मा,डॉ.सविता मोहन,कृष्ण कुमार भगत,शालिनी जोशी,डॉ.एस.सी पाठक,रणवीर सिह चौहान,ललित मोहन रयाल,अमित श्रीवास्तव,हेमचंद सकलानी,शशिभूषण बडोनी,गुरुचरन,जहूर आलम,महीपाल सिह नेगी,योगेश भट्ट,जगमोहन रौतेला,रंजना शर्मा,शिव प्रसाद सेमवाल, मुकेश नौटियाल,अनिल कार्की,डॉ.एम.आर सकलानी,जगमोहन आजाद,चन्द्र बी रस्याली,राकेश पांडे,दिनेश कुकरेती.राजेश सकलानी,रुचिका उनियाल,नवीन चंद्र उपाध्याय,महेश चिटकारिया, ज्योति शर्मा,डॉ.अशोक शर्मा,प्रीति बहुखंडी,वैशाली डबराल और रोशनी उनियाल जैसे जाने-माने लेखकों के कमरे की छवि है,संघर्ष हैं और जीवन का वह सत्य है,जो इन्होंने जीया है। जिसको पुस्तक के रूप में उकेरा है,प्रबोध उनियाल ने वह ऐसे समय में जब कहा जा रहा हैं कि पठन-पाठन की रूचि कम हो रही है। लेकिन प्रबोध उनियाल के संपदान में प्रकाशित ने मेरा कमरा पुस्तक ने पठन-पाठन की रूचि इस कदर बढ़ा दी हैं कि पाठक मेरा कमरा के बहाने पठन के प्रति सजग, प्रोत्साहित और आनंदित होगा। 

पुस्तक-मेरा कमरा

सम्पादक-प्रबोध उनियाल

प्रकाशन-काव्यान्श प्रकाशन,वाशिष्ठ सदन रेलवे रोड ऋषिकेश (उत्तराखंड) मूल्य 259/ रु मात्र