नाचा दौड़ा मारा फाल,फिर बौडी ऐगी बग्वाल

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संजय शर्मा दरमोड़ा

आज उत्तराखंड में इगास-बग्वाल मनाई जा रही है। उत्तराखंड का लोक पर्व इगास-बग्वाल,हर घर से पूड़ी,स्वाले,पकोड़ियों की महक आ रही है। भैलो खेल जा रहे है। मां लक्ष्मी की पूजा के साथ ही सदियों पूरानी लोक सांस्कृतिक परंपरा हर आंगन में लोक गीतों और भैलो खेलो के साथ जींवत हो चुकी है।

दीपावली के ठीक 11 दिन बाद मनाए जाने वाले लोक पर्व इगास-बग्वाल के पहाड़ पर कई लोक सांस्कृतिक एवं पारंपरिक परिवेश है। जिन्हें आज भी उसी तरह से पहाड़ के लोगों ने जीवित रखा है। जिस तरह से यह सदियों पहले थे।  

आज कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी है। आज की एकादशी को ‘देवउठनी एकादशी’ भी कहा जाता है। आज भगवान श्रीहरि चतुर्मास की निंद्रा से जाग गए हैं। देवउठनी एकादशी से सभी शुभ कार्यों की शुरुआत मानी जाती है। हमारे उत्तराखंड में आज ‘इगास’ का त्योहार है। बचपन के दिनों को याद करें तो हमारे लिए ‘इगास’ का मतलब होता है स्वाले,पकोडे,भूड़े और मीठे स्वादिष्ट पकवान खाने का दिन। लेकिन अगर हम ‘इगास’ के आयोजन और प्रयोजन पर जाएंगे तो हमें पता चलता है कि यह वीर भड़ माधो सिंह भंडारी की वीरता और बुद्धिमत्ता के बखान और नमन का पर्व भी है।

माना तो यह भी जाता है कि जब कुंती के बलशाली पुत्र भीमसेन ने दुर्दांत राक्षस का वध किया था तो भीम के पराक्रम और शौर्य की गाथा के जयघोष में ‘भैला’ खेला जाता है। लोकमान्यता तो यह साबित करती है कि लंका विजय के बाद भगवान श्रीराम जब अयोध्या लौटे तो दीपावली मनाई गई। भगवान श्रीराम के अयोध्या लौटने का समाचार केदारखंड के वासियों को 11 दिन बाद मिला इसीलिए उत्तराखंड में दीपावली के 11 दिन बाद इगास के रुप में दीपावली मनाई जाती है।

भगवान विष्णु को केदारखंड के लोग श्रीकृष्ण अवतार में मानते और पूजते हैं। श्रीकृष्ण को उत्तराखंड में ‘नागराजा’ के रुप में पूजने की पुरातन परंपरा रही है। ‘इगास’ का पर्व आप सभी के जीवन में हर्ष और उत्साह का संचार करे। मैं सभी के प्रति ऐसी ही सद्भावना रखते हुए जगत पालक भगवान श्रीहरि से जगत कल्याण की कामना करते हुए ओम जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे। भक्त जनों के संकट क्षण में दूर करे की प्रार्थना करता हूं। हे जगत के ईश जगदीश्वर भगवान कोरोना संक्रमण के संकट को अब जरूर दूर करें।